राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० राजतरंगिणी शीतल वायु के कारण तपती नहीं। ग्रीष्म ऋतु आने पर फारस की खाड़ी तथा भूमध्य सागर से आती वायु के कारण साइक्लोन, अन्धड़ आता है। वर्षा होती है। फरवरी मार्च तथा आधे अप्रैल तक पानी बरस जाता है। पहाड़ियों पर वर्षा औसतन २६ इंच होती है। शीत काल में कश्मीर उपत्यका में १६ इंच वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु में ८ इंच पानी बरसता है। अप्रैल से अक्टूबर तक तापमान ५४ से ९६ डिग्री तक रहता है। अतएव ग्रीष्म काल में हवा मातदिल और खुश्कवार होती है। कश्मीर उपत्यका में केला, बरगद, पीपल, आम, अमरूदादि के वृक्ष नहीं उगते। अलरोट, चिनार, सफेदा, देवदार, वेद तथा चीड़ के वृक्ष खूब दिखाई देते हैं। सेब, नासपाती, खुबानी, चेरी, समालू, अलरोट, आलूचा, बादाम तथा शाक भाजी होती है। अन्नो में शाली होती है। शाली मुख्य उपज है। इसके लिये गरम और मरतूब हवा पानी की आवश्यकता होती है। जमीन समतल तथा पानी का उसमें रुकावट होना चाहिए। पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा धान की खेती होती है। उप- त्यका के मैदान में खेतों में शाली बोयी जाती है। काश्मीर उपत्यका में ही शाली की फसल सबसे अधिक होती है। उपत्यका की भूमि समतल तथा उपजाऊ है। उपत्यका के लोगों का शाली अर्थात् चावल सर्व- प्रिय भोजन है। कश्मीर राज्य में अब भी चावल- भोजी लोगो की आबादी अधिक है। दक्षिणी भाग में में भूमि समतल है। सिंचाई का सुपास है। यहाँ पर प्राचीन काल से अत्यधिक शाली पैदा होती है। अनेकानेक नागों, सरोवरों, वितस्ता तथा कुओं से सिंचाई होती है। कश्मीर उपत्यका में धान बोने का समय चैत्र अर्थात् १३ अप्रैल से आरम्भ होता है। सितम्बर १३ से धान काटने का समय आरम्भ हो जाता है। हिन्दो मास से कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने का मुहूर्त माना जाता है। कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय भी खेती का यही प्रकार था। मौसम में भी परिव- र्तन नहीं हुआ है। शरद् ऋतु कुआर और कार्तिक का महीना होता है। भाद्रपद भादों का महीना होता है। धान कट कर शरद् अर्थात् कुआर कातिक में तैयार हो जाता है। भारत में धान की बोआई जुलाई अर्थात् आषाढ़ मास में होती है। विभिन्न प्रकार के धान विभिन्न समयों पर काटे जाते हैं। मुख्य फसल धान की होती है। जुलाई में बोकर अगहन या कार्तिक के अन्त में काटते हैं। कश्मीर में यह समय अप्रैल मई में बोआई तथा सितम्बर अक्टूबर में कटाई का होता है। इस समय कश्मीर राज्य में १९० हजार हेक्टर क्षेत्रफल में शाली बोयी जाती है। इस समय शाली २१० मेट्रिक टन होती है। गेहूँ केवल ६६ हजार, तथा चना ७ हजार मेट्रिक टन होता है। अतएव शाली मुख्य खाद्य पदार्थ है। शाली के बाद मक्का १७० हजार हेक्टर टन १८० हजार मीटर क्षेत्र में बोया जाता है। शरद् कालीन वायु उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूरव बहती है। यह हवा झंझावात, साइक्लोन, उपल वृष्टि तथा शीत के साथ प्रायः उग्र होने पर आती है। कश्मीर तथा हिमाचल में तुषारपात एवं शीत- लहरी आनेपर उसका तुरन्त प्रभाव दिल्ली, पंजाब तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पड़ता है। दक्षिण पूरव से चलने वाली हवा नम तथा गर्म होती है। वह मानसून होती है। उससे वर्षा होती है। कश्मीर में भाद्रपद मास में वायु उत्तर पश्चिम से चलने लगती है। उत्तर से आने वाली वायु हिमाच्छादित तथा शीत कटिबन्ध से आने के कारण शीतल होती है। यह तापमान घटा देती है। अतएव असमय ही कश्मीर में तुषारपात हो जाता है। कल्हण ने सत्य ही इस भौगोलिक दशा, प्राकृतिक जलवायु तथा उसके प्रभाव की ओर संकेत किया है। भाद्रपद में प्रायः शाली अधपकी हो जाती है। तुषारपात से शाली लोट जाती