राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४१७ तत्तत्कर्मव्यतिकरकृतः पारतन्त्र्यानुरोधा- त्सज्जाः सर्वे व्यवसितहठोन्मूलनाय प्रयत्नात् । चित्रं तत्राऽप्युदयति विधेः शक्तिरत्यद्भुतेयं यन्माहात्म्याद्विविधघटनासिद्धयो निर्निरोधाः ॥ ९३ ॥ ९३. “तत् तत् कर्म संसर्ग में संलग्न, सब लोग पारतन्त्र्य के अनुरोध से, सुनिश्चित (नियति) का प्रयत्न पूर्वक हठात् उन्मूलन हेतु समुद्यत होते हैं, किन्तु आश्चर्य है, वहां भी विधाता की यह अद्भुत शक्ति उदित हो जाती है। जिसके प्रभाव से, द्विविध घटना सिद्धियाँ निरोध रहित हो जाती हैं।” मणिपूरपुरे पार्थं निहतं समजीवयत् । फणिकन्याप्रभावेन सर्वाश्चर्यनिधिर्विधिः ॥ ९४ ॥ .९४. सभी आश्चर्यों के निधि विधि ने मणिपुर¹ में निहत पार्थ को नागकन्या² के प्रभाव से जीवित किया था । पादटिप्पणियाँ : महाभारत युद्ध के पश्चात्, महाराज युधिष्ठिर ९३. राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५०वाँ ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया । यज्ञीय अश्व के श्लोक है । साथ अर्जुन मणिपुर पहुँचे । बभ्रुवाहन ने अश्व पाठभेद : पकड़ लिया । जब उसे मालूम हुआ कि उसके पिता श्लोकसंख्या ९४ में 'वेन' का पाठभेद 'वेग' का अश्व है तो द्रव्यादि भेंट के साथ वापस कर दिया । मिलता है । पादटिप्पणियाँ: अर्जुन को पुत्र का यह कार्य कायरता पूर्ण प्रतीत हुआ । उसने धनादि लोटा दिया ! ९४ (१) मणिपुर : इस समय केन्द्रीय शासित प्रदेश है । इसका क्षेत्रफल २२१४६ वर्ग कीलो अर्जुन का व्यंग बभ्रुवाहन समझ गया । उसने मीटर है । भागवत पुराण (९:२२:३२) के अनुसार अपने मन्त्री सुबुद्धि से परामर्श कर अश्व पकड़ यहाँ की राजकन्या के गर्भ से अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन लिया । सेनापति सुमति के साथ अर्जुन पर आक्रमण हुआ था । किया । अर्जुन, ससैन्य केवल पराजित ही नही हुआ; (२) नागकन्या : मणिपुर के राजा चित्रवाहन उसे अपने प्राण भी गवाना पड़ा । अर्जुन की ओर थे । उनकी कन्या का नाम चित्रांगदा था । विवाह से कर्ण पुत्र वृषकेतु भी इस युद्ध में मारा गया था । अर्जुन के साथ हुआ था । उनका पुत्र बभ्रुवाहन था । गर्वोन्मत्त बभ्रुवाहन ने पिता के परास्त तथा पुत्र को अर्जुन ने चित्रवाहन को दे दिया । विवाह हत्या की बात माता चित्रांगदा से आकर कही । के समय चित्रवाहन ने शर्त रखी थी । चित्रांगदा से चित्रांगदा पति की मृत्यु का समाचार सुनकर, विलाप उत्पन्न पुत्र, उसका राजवंश चलायेगा । चित्रवाहन करने लगी । अर्जुन के शव के साथ सती होने का नाना होते भी बभ्रुवाहन का धर्मपिता था । यह निश्चय किया । बभ्रुवाहन को पितृ-हत्या के दोष मणिपुर का कालान्तर में राजा हुआ । ( म० आ० का अपराध मालूम पड़ा । वह भी आत्महत्या करने २०६:२४-२६; २०७:२१-३३ ) पर तत्पर हो गया । ५३