भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 556

गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा । ( म० भा० ३८:१३-२८ ) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला । वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंश के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० ) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था । तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ । ( भा० १२:६ ) महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति माँगने लगे । परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने मित्रो को दे दिया । परिक्षित ने फल फोड़ा । उसमे से एक लाल कीड़ा निकला । उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ दिन पूरा हो रहा है । कहीं यही न तक्षकराज बन जाय ?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया । परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया । पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शतं' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० : ४:२४:३२ )

( ३ ) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रो आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया । द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की । अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ ) अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्माशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी । व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवो के शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नही किया । किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया । उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा । अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा । उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया । भगवान् ने शिशु की रक्षा की । विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया । महाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था । अतएव परिक्षित नाम पड़ा था । ( म० अश्व० ७० : १० )