राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४२३ अथ पुर्यष्टकभ्राम्यदनाक्रान्तान्यविग्रहम् । योगेनाकृष्य योगिन्यस्तत्र संधिमतेन्यधुः ॥ १०५ ॥ १०५. सन्धिमति के पुर्यष्टक को आकृष्ट कर योगिनियों ने उस (शरीर) में रख दिया। ततः सुप्तोत्थित इव प्रत्तदिव्यविलेपनः । समभुज्यत ताभिः स यथेच्छं चक्रनायकः ॥ १०६ ॥ १०६. तत्पश्चात् सुप्तोत्थित सदृश दिव्य लेपन लिप्त उस चक्र नायक¹ ने उनसे समुप- भोग किया। ईशानस्तस्य देवीनां वितीर्णोऽङ्गहृति पुनः । क्षपायां क्षीयमाणायां चकितः पर्यशङ्कत ॥ १०७ ॥ १०७. रात्रि के क्षीयमाण होने पर, चकित ईशान ने देवियों द्वारा उसके (सन्धि- मति के) सम्पृक्त अंगों के हरण की आशंका की। नदंस्तद्रक्षया धीरः स च तत्स्थानमाययौ । तच्च योगेश्वरीचक्रं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १०८ ॥ १०८. वह धीर उसकी रक्षा हेतु, नाद करता हुआ उस स्थान पर आ गया और वह योगिनी समूह तत्क्षण अन्तर्हित हो गया । श्लोक संख्या १०५ में 'पुर्यष्टक' का 'पुर्यष्टकं' 'भ्राम्यद' का 'भ्राम्यन्म' तथा 'योगिन्यः' का 'योगेश्यः', 'योगेश्य' 'योगेभ्यः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०५ ( १ ) पुर्यष्टक—पुर्यष्टक का विशद वर्णन रूप, कार्यकलापादि का 'योगवासिष्ठ रामायण' में मुख्यतः लीला उपाख्यान में किया गया है। द्रष्टव्य है—'योगवासिष्ठ कथा' पाठभेद : श्लोक संख्या १०६ में 'सुप्तो' का 'स्वप्तो' तथा 'प्रत्तदि' का पाठभेद 'प्रमुदि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०६ (१) चक्रनायक : जोनराजने चक्रनायक के स्थान पर योगिनी नायक शब्द का प्रयोग किया है। योगिनीनायको दूरात् परिज्ञाय नृपात्मजम् । योगिनीनिकटं प्रापुर्बिकटप्रकटौजसः ॥३४८॥ चक्रनायक एक आयुर्वेदिक ओषधि होती है। भैरवी चक्र में उसके नेता के रूप में चक्रनायक एवं चक्रेश दोनों शब्द मिलता है। वह तान्त्रिक चक्र का अधिष्ठाता माना जाता है। चक्रनायक का भी अर्थ व्याघ्रनख नामक गंध द्रव्य होता है। योग तथा तन्त्र साहित्य में चक्रों का वर्णन मिलता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाषट्चक्र व्यक्ति के रीढ़ प्रदेश पर शरीर के अति निम्नभाग से मूर्धा तक जाता है। मूर्धा पर सहस्रधारा होती है। शुभाशुभ के निर्णय हेतु स्वर तथा सर्वतोभद्रादि ८१ चक्रों का उल्लेख मिलता है। पाठभेद : श्लोकसंख्या १०७ में 'ईशानस्तस्य' का 'ईशानतस्य' तथा 'र्णाङ्गहृति' का पाठभेद 'र्णाङ्गाह्णति' मिलता है।