राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 595, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४५० राजतरंगिणी राजा सन्धिमति उत्तर दिशा की ओर चलता हुआ भूर्ज पत्तों के मर-मर से पूर्ण गुहागेह में रहने वाले सिद्ध जनो के स्थान पर पहुँचता है । वहाँ से वह पुनः नन्दि क्षेत्र की तरफ जाता है । नन्दि- क्षेत्र हर मुकुट पर्वत पर है । हरिमुकुट की यात्रा वे गन्ध अर्थात् सिन्ध वैलो होने पुनः हरमुकुट गंगा का मार्ग पकड़ते हुए नारायण बल होते, गंगाबल पहुँचते हैं । इस समय यहाँ की यात्रा कर श्रीनगर आदि होते, नारायण बल की तरफ से लौटते है । मैने ब्रूजहोम की गुफाएं देखी है । आजकल भी भारतवर्ष के कितने ही स्थानों पर साधु इस प्रकार की गुफाओं में रहते है । मै समझता हूँ ब्रूजहोम का नाम भूर्ज वृक्ष के आधार पर पड़ा है। इन गुफाओ में कौन रहते थे । उनमे मानव कंकाल ६॥ फुट लम्बे तक के मिले हैं। गाड़ने की प्रथा हिन्दुओ मे नही थी। केवल साधु संन्यासी अथवा सिद्ध गण समाधि लेते थे । तत्कालीन समय में यहाँ केवल हिन्दू रहते थे । अतएव सन्धिमान सिद्धजनो के स्थान में पहुँचता नन्दि पर्वत गया था । यह स्थान नन्दि पर्वत यात्रा के मार्ग में है । अतएव यही स्थान गुहागेह निवासियो का है । १ गव्यूती : हरकन में टाइल्स मिली है जिनमें लोगो के उँकड़ू बैठे हुए दिखाया गया है । यही आसन समाधि में मिले दो चार कंकालों का मैने देखा है। वे लम्बे सुला कर नही गाडे गए थे । उँकडू अधिक मिले हैं। समाधि देने की प्रथा है कि पद्मासन लगाकर समाधि में रख देते थे, एक प्रकार और था । खड़ी शव समाधि में सड़ाकर ऊपर से मिट्टी डाल देते थे । यहाँ खड़े शव पद्मासन रूप में रखा गया होगा । कालान्तर में एक पैर खुल गया और पृष्ठ भाग गड्ढे में पीछे लग गया । यही रूप खडे शव का है । यहाँ पर ईंटें भी मिली हैं । इन ईंटों का आकार नारायण नाग में मिली ईंटों से मिलता है । स्टाइन सन्धिमति का काल १०४४१ वर्ष देता है । चाहे यह समय बिल्कुल ठीक भी न हो परन्तु सन्धिमति का समय २ हजार वर्ष पूर्व ही ठहरता है । यदि वैज्ञानिक शोधन से यह शव दो हजार वर्ष पूर्व का ठहरता है तो मेरा अनुभव ठीक है। यहाँ मैने एक शव और देखा । जिसके मस्तक की हड्डियाँ टूटी थीं । एक प्रथा थी शव समाधि में रखने पर मूर्धापर नारियल अथवा ऐसी चीज से मारते थे कि मूर्धा भग्न होजाय । यही कार्य कपाल क्रिया के रूप मे श्मशान में की जाती है । मस्तक तोड़ दिया जाता है । पत्थर के सामान यहाँ मिलते हैं। साधुओं को धातु स्पर्श निषेध किया गया है। आज कल भी संन्यासी लोग पत्थर के बर्तनों में भोजन करते हैं । सभी गृहस्थों के यहाँ चटनी आदि खाने तथा खट्टा और दही आदि चीज रखने के लिए पथरी रखी जाती है। इसका अर्थ यह नही है कि हम पत्थर युग में हैं। हड्डियों की सुइयों के विषय में यही कहना अलम है कि धातु की सुई बनाना वर्जित था । पर मूर्तियाँ जो निकली हैं वे हिन्दू काल की हैं उन्हें लोहे छेनी से गढ़ा गया है। वे हड्डियों तथा पत्थरो के औजारों से नही बन सकती थी अतएव उस समय लोहा का आविष्कार हो चुका था। जब लोहा प्राप्त था तो हड्डियों की सुई क्यों बनाई गयी । इसका एक मात्र कारण यही है कि धातु का स्पर्श वर्जित था । मेरा उक्त मत केवल अनुमान पर आधारित है। गुहागेह का शब्दार्थ इस बात की ओर लक्ष करता है कि गुफा प्रकार के घरों मे लोग निवास करते है। अफगानिस्तान के बामियान स्थान में पर्वत में सैकड़ो से भी अधिक गुफा मैने स्वयं देखी हैं यहाँ भिक्षु तथा वहाँ रहने वाले उन गुफाओ में रहते थे । इस समय अनेक गुहागृह ध्वस्त हो गये हैं । परन्तु अत्यधिक अपना रूप कायम किये हैं। यह पहाड़ पत्थर के नही सख्त मिट्टी के हैं । इस लिये गुफायें बहुत नष्ट हो गयी हैं अथवा गिर गयी है।