राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० राजतरंगिणी तप्तायःशङ्कुनेयान्तर्व्रणितः स द्रुतं ततः । संचारिणाऽऽतपत्रेण सन्ना तां वसुधामगात् ॥ ३२ ॥ ३२. तप्त लौह शंकु से अन्तर्विध सदृश (नृप) संचारो आतपत्र¹ (राज-छत्र) के साथ शीघ्र ही उस भूमि पर गया। अपश्यदथ केनापि चण्डिकायतनाग्रतः । नरं शबरसेनान्या हन्यमानमघोमुखम् ॥ ३३ ॥ ३३. वहाँ देखा—चण्डिकायतन¹ के आगे कोई शबर² सेनानी अधोमुख नर को मार रहा है। श्लोक संख्या ३२ में 'तः' का 'तस्य'; 'द्रुतं' का 'श्रुत', तथा 'सन्ना तां' का पाठभेद 'स तत्र'; 'सन्नाता' 'सद्भाता' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२ (१) आतपत्र = छत्र: यहाँ तात्पर्य श्वेत वरुण छत्र से है। छत्र के सन्दर्भ में एक पौराणिक कथा मिलती है। किस प्रकार छत्र की उत्पत्ति हुई थी। देवी रेणुका महर्षि जमदग्नि की धर्मपत्नी थी। सूर्य ताप से कदाचित् विकल हो गयी। महर्षि अपनी पत्नी की व्याकुलता देखकर क्रुद्ध हो गये। सूर्य के वध के हेतु धनुष बाण उठाया। सूर्य भगवान् भयभीत हो गये। प्रकट हुए। एक छत्र बनाकर महर्षि को दिया। सामान्य छत्र तथा राजछत्र में भिन्नता होती है। छत्र, चामर, मुकुट आदि राजा के चिन्ह माने जाते हैं। सम्राट् के छत्र का चतुर्थांश युवराज का छत्र होता है। सम्राट् के छत्र के अग्रभाग में भिन्नता प्रदर्शन हेतु आठ अंगुल की एक पताका लगी रहती है। इस छत्र को दिग्विजयी छत्र कहते हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या ३३ में 'शबर' का पाठभेद 'शवर' मिलता है। पादटिप्पणियाँ (१) आयतन. देवस्थान यज्ञ स्थान के अर्थ में यहा इस शब्द का प्रयोग किया गया है। आध्या- त्मिक दृष्टि से छः आयतन बाहर तथा छ. भीतर होते हैं। चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय एवं मन आन्तरिक आयतन हैं। बाह्यायतन रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श एवं धर्म हैं। प्राणियों की तृष्णाओं के कारण उक्त बारह आयतन हैं। तृष्णाओं के परे हैं। भवन, गृह, निवेशन, आलय, वेश्म, आयतन, अट्टालक इन शब्दों का प्रयोग नीलमत पुराण में किया गया है। उनमें क्या भेद या इन पर प्रकाश नहीं डाला गया है। (नी० 187, 359, 362, 364, 369, 370, 400, 551, 558) (२) शबर : पुराणों के अनुसार यह एक विशेष म्लेच्छ जाति थी। ये दक्षिणापथ के निवासी थे। वायु पुराण में इन्हें 'दक्षिणा- पथवासिनः' कहा गया है। इनका उल्लेख, आभीर, आटव्य, पुलिंद, वैदर्भ, दण्डक आदि के साथ प्राप्त होता है। (वायुः ४५:१२६) ब्राह्मण ग्रन्थो के अनुसार विश्वामित्र के ज्येष्ठ पचास पुत्र उन्हीं के शाप से आन्ध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिंद आदि हो गये थे (ऐ. ब्रा० ७: १८: २; सां. श्रौ: १५: २६: ६) वह दक्षिण मे पेन्नार नदी के प्रदेश मे रहते थे। रामायण में प्राप्त शबरी की कथा इस ओर संकेत करती है। इनकी आबादी राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश आदि में थी। महाभारत के अनुसार शबर मूलतः क्षत्रिय थे परन्तु आचार त्याग देने के कारण म्लेच्छ हो गये थे। महाभारत में शबरों ने कौरवों के पक्ष से युद्ध