राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४८६
तथा योधेय सम्मिलित थे । योधेय का अर्थ आयुध- जीवो संघ कहना उचित होगा । शस्त्रोपजीवी होने के कारण उन्हें क्षत्री माना जाता था । महा- भारत में सभा पर्व (३७:७:३२; ५२:१४-१५) में त्रिगर्त पाण्डवों से पराजित हो गया था । सभा पर्व ८:२० में उन्हें क्षत्री कहा गया है। मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख आता है : कर्णप्रावरणाश्चैव हूणाश्चाः सकृच्छ्रुकाः । त्रिगर्ता मालवाश्चैव किरातास्तामसैः सह ॥ मार्कण्डेय तथा वायुपुराण में 'त्रिगर्ता माल- वाश्चैव, पुनः मार्कण्डेय पुराण में 'त्रिगर्ता मालवा श्चैव' ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिगर्ता मालवाश्चैव' वामन में 'त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमराः शशि- खादिकाः' उल्लेख मिलता है । वामन पुराण पर्वताश्रयी देशों में चौदह आदि की तालिका में त्रिगर्त को रखा गया है । वामन० १३:५६-५७ 'कर्ण प्रावरण, हूण, दार्ब, त्रिगर्त, मालव, किरातादि हिमालय की पर्वतीय जातियां हैं । मालव शब्द से भ्रम हो सकता है । वे कही वर्तमान मालवा के समीप तो नहीं थे । प्राचीन काल में सप्त मालव का उल्लेख मिलता है । त्रिगर्त वर्तमान जालन्धर तथा कांगड़ा अंचल कहा जाता है। यहां पर वर्णित मालव शब्द सतलज क्षेत्र के लिये आया है । किरात जाति आधुनिक किरात्तो है । इसी जाति ने कभी नेपाल के एक भाग पर शासन किया था । स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में त्रिगर्त का नाम नहीं है । परन्तु क्रम संख्या १४ पर जाल- न्धर का नाम दिया गया है। मालूम होता है । उस समय त्रिगर्त जालन्धर क्षेत्र में मान लिया गया था । क्योकि तोमर देश की क्रम संख्या ५४ स्कन्द पुराण में दी गयी है । निस्सन्देह जालन्धर का क्षेत्र बहुत विस्तृत था । प्राचीन त्रिगर्त रावी तथा सतलज नदी के मध्य, जालन्धर का प्रदेश था । प्राचीन ग्रन्थों में कांगड़ा ६२
का नाम त्रिगर्त दिया गया है । मेरे अनेक कांगड़ा निवासी मित्र जो भारतीय संसद् के सदस्य हैं, स्पष्ट कहते हैं-कांगड़ा ही प्राचीन त्रिगर्त देश है। जनरल कनिघम का मत है कि कांगड़ा ही त्रिगर्त देश है । चम्बा पर्वतमाला तथा व्यास नदी के ऊर्ध्व भाग में स्थित है । उनका यह भी मत है कि, त्रिगर्त क्षेत्र तीन नदियो अर्थात् रावी, व्यास एवं सतलज द्वारा सिंचित होता था । प्रोफेसर जानसन का मत है कि कटोच राज्य त्रिगर्त देश कहा जाता है । मै स्वयं कागडा मे घूमा हूँ । स्थानीय राजाओं से भी भेंट की थी । यह जनश्रुति सुदूर प्राचीन काल से चली आती है कि त्रिगर्त कागड़ा है । इसी का वर्णन महाभारत तथा पुराणो में किया गया है । कल्हण ने त्रिगर्त का पुनः उल्लेख ३:१००, २८५, ५:२४४, ७:२२४, तथा ८:५३० में किया है । दशकुमार चरित में तीन धनाढय कुलो के त्रिगर्त जनपद में निवास करने का मित्रगुप्त के पर्यटन सन्दर्भ में उल्लेख मिलता है । उस समय १२ वर्षों का भयंकर अवर्षा था । नदियाँ तक सूख गयी थी । हेमचन्द ने अभिधान चिन्तामणि में त्रिगर्त तथा जालन्धर का समानार्थक रूप में प्रयोग किया है । वर्तमान पंजाब का उत्तरी पूर्वीय भाग जो चम्बा से कागडा तक विस्तृत है और जो इस समय हिमालय प्रदेश में है, त्रिगर्त कहा जाता था । सतलज, व्यास तथा रावी नदियों की तीन घाटियों अर्थात् गर्त किंवा द्रोणियों के कारण इसको त्रि तीन गर्त (घाटी ) कहा जाता था । इसका नाम जालन्धरायण भी था । रावी तथा व्यास के संकुचित मार्ग से देश में प्रवेश होता था । आज भी यह मार्ग चलता है । गुरदासपुर तथा पठानकोट के जिले त्रिगर्त राज्यान्तर्गत थे । यहाँ से औदुम्बर गणराज्य की मुद्रायें प्राप्त हुई है।