राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ राजतरंगिणी निवार्य मरणोद्योगं मातृनिर्वेदखेदितः । ययौ प्रवरसेनोऽथ तीर्थौत्सुक्याद्दिगन्तरम् ॥ १२३ ॥ १२३. माता के मरणोद्योग^१ को रोक कर वेदना से खिन्न, प्रवरसेन तीर्थ करने की उत्सुकता से दिगन्तर गया। रक्षित्वा दशमासोनाः क्ष्मामेकत्रिंशतं समाः । तस्मिन्क्षणे हिरण्योऽपि शान्तिं निस्सन्ततिर्ययौ ॥ १२४ ॥ १२४. उस समय सन्तान रहित हिरण्य भी दश मास कम इकतीस वर्ष पृथ्वी की रक्षा कर शान्ति (मृत्यु) प्राप्त किया। तत्रानेहस्युज्जयिन्यां श्रीमान्हर्षापराभिधः । एकच्छत्रश्चक्रवर्ती विक्रमादित्य इत्यभूत् ॥ १२५ ॥ १२५. उस समय उज्जैनी में एकछत्र चक्रवर्ती श्रीमान् विक्रमादित्य^१ हुआ जिसका अपर नाम हर्ष था।
पादटिप्पणियाँ : १२३ ( १ ) मरणोद्योग : तोरमाण के मरने पर रानी स्वयं सती होना चाहती थी। उसके इस प्रयास को प्रतीत होता है प्रवरसेन ने रोका और माता को सती होने से विरत किया। पाठभेद : श्लोक संख्या १२५ में 'हर्षापराभिध.' का पाठभेद 'हर्षाभिधा पुरा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १२५ ( १ ) विक्रमादित्य : तरंग २:७ में कल्हण ने हर्ष का उल्लेख किया है। श्लोक २:९ में कल्हण स्पष्ट कहता है कि वहाँ वर्णित हर्ष किंवा विक्रमादित्य शकारि विक्रमादित्य नही था। कल्हण के अनुसार शकारि विक्रमादित्य वहीं मातृगुप्त पड़ते हैं। शकों को पराजित करने के कारण शक संवत् ईसवी सन् ७८ में प्रचलित किया गया था। शक पराजय का उल्लेख कल्हण अगले १२८ वें श्लोक में पुनः करता है। उसने इस तरंग के श्लोक ३३० में पुनः कहा है कि शीला-दित्य प्रतापादित्य का पिता हर्ष विक्रमादित्य था। ह्वेन सांग ने शीलादित्य का उल्लेख अपने पर्यटन संस्मरण में किया है। ( २:२६१ ) उसका शासन काल सन् ५८० ईसवी मालवा में था। शक संवत् दक्षिण तथा कश्मीर में भी चलता है। गणतंत्र के पश्चात् भारत सरकार ने भी शक ही संवत् को स्वीकार कर मान्यता दी है। सरकारी कागजो में अब इसी का व्यवहार किया जाता है। इस समय विक्रम संवत् २०१५ शक संवत् १८९० तथा अंग्रेजी सन् १९५८ है। मुस्लिम इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के सम्बन्ध में भ्रम पैदा कर दिया है। वे एक नाम विक्रमादित्य का ही दुहराते हैं। किसी भी विक्रमा-दित्य के सम्बन्ध में न कुछ आलोचना करते हैं और न उनका समय आदि देते हैं। उनसे इस सम्बन्ध में कुछ सहायता नहीं मिलती।