राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ राजतरंगिणी स शापितोऽस्मद्देहेन यो लेखं वाचयेत्पथि । संविदेषा प्रयत्नेन विस्मर्त्तव्या न जातुचित् ॥ २०८ ॥ २०८. पथ में जो लेख पढ़े, — "उसे मेरे देह की शपथ है।" प्रतिज्ञा प्रयत्न पूर्वक कभी मत भूलना। अविज्ञाताशयो राज्ञस्तामाज्ञां : क्लेशशङ्कितः । सोऽबुद्ध दहनज्वालां न तु रत्नाङ्कुरद्युतिम् ॥ २०६ ॥ २०९. (नृपति के) आशय को न जानकर क्लेश शङ्कित, उसने राजा के उस आज्ञा को अग्नि ज्वाला जाना, न कि रत्नाङ्कुर कान्ति। यथादेशस्तथेत्युक्त्वा मातृगुप्ते विनिर्गते । निर्गर्वः पूर्ववद्राजा तस्थावाप्तैः सहाल्पन् ॥ २१० ॥ २१०. 'जैसी आज्ञा' — कहकर, मातृगुप्त के विनिर्गत हो जाने पर, गर्व रहित नृप पूर्ववत् आप्तजनों के साथ संलाप करता हुआ, स्थिर रहा। अथाक्लेशोचितं क्षाममपाथेयमवान्धवम् । दृष्ट्वा यान्तं मातृगुप्तं निनिन्देति नृपं जनः ॥ २११ ॥ २११. अक्लेशोचित, क्षाम, सम्बल रहित, बन्धु, विहीन, मातृगुप्त को जाते हुए देख कर लोग नृप की निन्दा करने लगे। अहो नरेश्वरस्येयं यत्किंचनविधायिता । पृथग्जनोचिते कर्म्मण्यर्हतो निदधाति यः ॥ २१२ ॥ २१२. अहो ! 'नरेश्वर की यह यत्किञ्चन विधायिता ? जो कि सामान्य जनोचित कार्य में योग्यों को नियुक्त करता है। दुराशया धृतक्लेशं सेवमानमहर्निशम् । ध्रुवं क्लेशार्हमेवैनं ज्ञातवान्बुधो नृपः ॥ २१३ ॥ २१३. 'दुराशा से अहर्निश सेवा करते दुःखी इसे निश्चय ही विद्वान् नृप ने क्लेश सहिष्णु (ही) जाना। शासन शब्द का प्रयोग नीलमत पुराण में भी अर्थ में इसका उल्लेख किया गया है। किया है। यहाँ पर यह शब्द शिव शासन के रूप में व्यवहृत किया गया है। प्राचीन निबन्धों में बुद्ध श्वमह चापि यस्यैव शासने सऽवस्थितौ य। शासन के समान शिव शासन सम्बन्धी निबन्धों के नील० १२४७ परिशिष्ट