भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५४२ राजतरंगिणी यान्यक्षराण्यन्तरेण वाच्यं वक्तुं न पार्यते । का गतिस्तदुदाने मर्यादोल्लङ्घनं विना ॥३०६॥ ३०९. 'जिन अक्षरों को कहे बिना अभिप्राय व्यक्त नहीं होता, उसे प्रकट करने में मर्यादा उल्लंघन के अतिरिक्त और कौन गति है ? अतः परुषमप्यद्य किंचिदेव मयोच्यते । अव्याजाज्जैवमप्येतदार्यस्त्वमवधीर्यते ॥३१०॥ ३१०. 'अतएव आज मैं कुछ परुष (शब्द) कहता हूँ यद्यपि (इससे) निष्कारण सरलतामयी भद्रता' तिरस्कृत हो रही है। सर्वः स्मरति सर्वस्य प्रागवस्थासु लाघवम् । आत्मैव वेत्ति माहात्म्यं वर्तमाने क्षणे पुनः ॥३११॥ ३११. 'पूर्व स्थितियों में सब लोग सभी लोगों के लाघव का स्मरण करते हैं, किन्तु वर्तमान क्षण में माहात्म्य (गौरव) को आत्मा ही जानता है। पूर्वावस्था मदीया ते त्वदीया या च मे हृदि । ताभ्यां विमोहितावावां न विद्मोऽन्योन्यमाशयम् ॥३१२॥ ३१२. "मेरी पूर्वावस्था आपके एवं आपकी मेरे हृदय में है। उनसे विमोहित हम दोनों एक दूसरे का आशय नहीं जानते हैं। राजा भूत्वा कथ मादृक्प्रतिगृह्णातु संपदः । कथमेकपदे सर्वमौचित्य परिमार्जतु ॥३१३॥ ३१३. 'राजा' होकर मुझ सदृश जन सम्पत्तियाँ कैसे ग्रहण करें ? सब औचित्य एका- एक (सहसा) कैसे परिमार्जित (नष्ट) कर दें ? पाठभेद : करना उचित समझा है। द्रष्टव्य श्लोक ३०९ में 'यान्यक्षरा' का पाठभेद 'तान्यक्षरा' मिलता है। ३११ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पादटिप्पणियाँ : ८०वां श्लोक है। ३१० (१) भद्रता : कल्हण ने 'आर्यत्व' शब्द ३१३ (१) राजा : राजा किसी का अनुग्रह द्वारा का प्रयोग यहाँ किया है। उसका अनुवाद 'भद्रत्व' प्रदत्त दान सहसा नहीं ग्रहण करता। राजा दान अधिक श्रेष्ठ है। मैंने आर्य का अर्थ यहाँ भद्र ही देता है। दान लेता नहीं है। यह पुरानी परम्परा है। इस श्लोक में यही भाव निहित है।