राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४६ राजतरङ्गिणी शुष्यत्तमालपत्राणि श्रीगंत्तादोदलानि च तत्तरोनाऽर्णवतोराणि चक्रेऽस्तित्वोमुखानि च ॥ ३२६ ॥ ३२६. इसकी सेना ने समुद्र तट को सूमते तमाल पत्रों तथा शोर्ण ताड पत्रों से युक्त, और मुक्त तिलक अङ्गनाओं के मुखों को शुक तिलफ एवं गलित ताड़पत्रवाला बना दिया। स गङ्गाऽऽलिङ्गनारम्भ पूर्वार्यगिरिभेद्यभान् । सैन्यैममदनिष्यन्दैः कालिन्दीसंगमश्रियम् ॥ ३२७ ॥ ३२७. उसने गङ्गा आलिङ्गित पूर्व समुद्र को पुष्ट गजों के मद स्राव द्वारा कालिन्दी संगम शोभा प्रदान किया। राधस्यपगलोपैः कटकैः शृङ्गदिकटैः । चकारोत्पाटनं सौराष्ट्राणां गङ्गापपाटनम् ॥ ३२८ ॥ ३२८. इसने दिगन्तव्यापी सेनाओं द्वारा परागाधि ( समुद्र ) तटवर्ती सौराष्ट्र- वासियों का उत्पाटन कर राष्ट्र भ्रंश कर दिया। यशोऽर्थिनः पार्थिवेषु द्वेषरागबहिष्कृतः । ववृधे धर्मविजयस्तस्य क्षितिशतक्रतोः ॥ ३२६ ॥ ३२९. पृथ्वोन्द्र यशःकांक्षी एवं द्वेष राग रहित इस नृपेन्द्र का राजाओं पर धर्म- विजय' बढ़ा। नील मत पुराण अगस्त्य दर्शन पर्व का उल्लेख करता है। यह पूजा उस समय की जाती है जब सूर्य का योग कन्या राशि में होता है। इन में उपवास रात्रि में पूग, नैवेद्य आदि से पूजा का विधान है। (742-747) । ३२६ (१) तमाल : यहाँ श्लिष्ट है। कल्हण ने यहाँ बहुत उत्तम उपमा दी है। इस श्लोक में श्लेष तुल्ययोगिता आदि अलंकारों का समावेश किया गया है। अतएव इसे संसृष्टि या संकर कहेंगे (ताडो आज भी पंजाब में एक प्रकार के कर्णफूल अर्थात इयररिंग को कहते हैं।) तमाल का अर्थ तमाल वृक्ष के साथ ही छाप ललाट भी होता है। ताड़ोदल का भी अर्थ ताड़पत्र तथा कर्णफूल होता है। पाद्टिप्पणियाँ : ३२७. (१) गंगा : गंगा का जल उज्ज्वल तथा यमुना का जल श्यामल काला होता है। तार्ह ७।१४७७ में इस श्लोक की उपमा तुलनीय है। इतिहासकार विंसेंटस्मिथ प्रवरसेन को शशांक पर पहुँचा देता है। वह कहता है कि बंगाल में उसने 'शांक' अर्थात् 'शशांक' के नप्ता 'जयगुप्त' को तोड़ कर राज्य 'दामोदर गुप्त' को दे दिया। वह शीला- दित्य का पुत्र था। लेखक ने इसे किसी प्रमाण पर आधारित नहीं किया है। पद्मांक और शांक दोनों एक ही वृक्ष के नाम हैं। ३२८. (१) सुराष्ट्र : कल्हण यहाँ अपने भौगो- लिक ज्ञान का उदाहरण उपस्थित करता है। कल्हण ने निसन्देह भारत भ्रमण किया था। उसने जो भी भौगोलिक स्थिति दी है वह ठीक उतरी है। सुराष्ट्र अर्थात् वर्तमान सौराष्ट्र को वह समुद्र तट तथा पश्चिम दिशा में बतलाता है जो सर्वथा ठीक है। सौराष्ट्र को काठियावाड़ भी कहते हैं। ३२९. (१) धर्मविजय : कल्हण ने यहाँ