राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५४९ धार्ष्ट्यादथाष्टमे वारे हेतुमाख्यातुमुद्यतम् । धिक्पशून्बध्यतां सोऽमित्यूचे नृपतिः क्रुधा ॥ ३३३ ॥ ३३३. आठवीं बार धृष्टता पूर्वक जब कोई कारण कहने को उद्यत हुआ तब राजा ने क्रोध पूर्वक कहा—'पशु को धिक्कार है इसे बाँधो।' अवध्योऽहं पशुत्वेन वीरेत्युक्त्वा भयोत्सुकः । मध्येसभं ननर्तास्य सोऽनुकुर्वन्कलापिनम् ॥ ३३४ ॥ ३३४. भयभीत वह 'ओ वीर ! पशु होने के कारण अवध्य हूँ।' यह कहकर सभा मध्य मयूर सदृश नृत्य करने लगा । नृत्तं केकां च शिखिनो दृष्ट्वाऽस्मै द्रविणं नृपः । अभयेन समं प्रादात्तालार्थचरणोचितम् ॥ ३३५ ॥ ३३५. नृप ने मयूर¹ की केका वाणी (सुन) एवं नृत्य देखकर इसे अभय के साथ नर्त्तकोचित द्रव्य प्रदान किया । वसतोऽस्य दिशो जित्वा नप्तुः पैतामहे पुरे । कर्तुं पुरं स्वनामाङ्क प्रथते स्म मनोरथः ॥ ३३६ ॥ ३३६. दिशाओं को विजय कर, पितामह² के नगर में निवास करते, इस नृप को स्वनामांकित पुर निर्माण करने की अभिलाषा हुई । मुम्मुनि के लिये कुछ विद्वानो ने कहा है कि वे श्लोकसंख्या ३३५ में 'तालाघव' का पाठभेद मोमिन थे । मोमिन मुसलमान थे वह शब्द खलीफा 'तालावध' मिलता है । के समान अमीरुल मोमनीन था । वह तर्क असंगत पादटिप्पणियाँ : है । परन्तु राजतरंगिणी में तीन राजाओ के ३३५ (१) मयूर नृत्य : मुम्मुनि ने मयूर सन्दर्भ में मुम्मियन का नाम आया है । ये प्रवरसेन नृत्य किया । यह कुछ विचित्र मालूम होता है । (३१८६ लौ० सं०) ललितादित्य (लो०३७७६सं.) सम्भव है मुम्मुनि वंश किया गोत्र अथवा जाति मे तथा जयापोड (लौ०३८२८सं०) थे । उनके काल मयूर नृत्य प्रचलित हो या उसके यश की विशेषता में शताब्दियो का अन्तर है । अतएव मुम्मुनि कोई रही हो । दक्षिण के लोगो में भरत नाट्यम् एक व्यक्ति नहीं था । अत्यधिक प्रचलित है जबकि उत्तर भारत में कथक एक मत है कि यह शाही तथा खाकान के समान नृत्य । उल्लास काल में मानव अपने मौलिक कोई रहे हो । ललितादित्य ने उन्हें उत्तर में अकृत्रिम रूप में आ जाता है । संस्कार जन्य कार्य सोपार तथा भोट्ट के मध्य जोता था । करना, गान एवं नृत्य अनायास वह करने लगता है । यही भाव इस श्लोक का है । पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३३ में 'पशून्च' का पाठभेद श्लोक संख्या ३३६ में 'प्रयते स्म' का पाठभेद 'पशुचं' मिलता है । 'पप्रथे स' मिलता है । २