भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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सो. कलकत्ता ने प्रकाशित किया। श्री एम. ए. ट्रोयर ने (सन् १८४०-१८४२ ई०) में राजतरंगिणी का फ्रेन्च अनुवाद तीन भागों में किया। बहाउद्दीन ने सन् १८४८ में लबुल तवारीख लिखा। श्री दीवान कृपा- राम ने सन् १८७१ में गुलजार-ए. काश्मीर की रचना की। चारो राजतरंगिणियों का अंग्रेजी में सारानुवाद श्री जोगेशचन्द्र दत्त ने किंग्स आफ काश्मीर के नाम से सन् १८७६ में किया। श्री हर गोपाल खस्ता ने गुलदस्तये काश्मीर लिखा। श्री मुल्ला अतुल नवी ने सन् १८८४ में वजीबुल तवारीख लिखा। राजतरंगिणी के पाठों के शुद्धीकरण तथा प्रकाशन का कार्य महामहोपाध्याय दुर्गा प्रसाद ने सन् १८९२ ई० में किया। राज तरंगिणी मूल तीन भागों में प्रकाशित की गयी। वैज्ञानिक शैली से अध्ययन तथा शोध का कार्य श्री स्टीन ने किया है। सन् १८९२ ई० में उन्होंने मूल संस्कृत का पाठशोधन कर मुद्रित करवाया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६० में हुआ है। पीर गुलाम हसन खुरहमी ने सन् १८९८ ई० में तारीख लिखा जो हसन की तारीख के नाम से प्रसिद्ध है। इसका उर्दू अनुवाद श्रीनगर से प्रकाशित हो चुका है। श्री स्टीन का प्रसिद्ध ऐतिहासिक अंग्रेजी अनुवाद सटिप्पण प्रथम बार सन् १९०० ई० में प्रकाशित हुआ था। श्री गोविन्द कौल ने राज तरंगिणी वर्णित स्थानों का पता लगाया था। श्री स्टीन ने उनकी सहायता से शेष स्थानों का और पता लगाया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६१ में मोती लाल बनारसी दास, दिल्ली के यहाँ से हुआ है। श्री निवारण चन्द्र विद्यारत्न ने सन् १९०४ ई०. में संस्कृत से बंगला अनुवाद कर प्रकाशित किया। सन् १९१० ई० में प्रथम तरंग से छठवें तरंग का बंगाली लिपि में मूल तथा अनुवाद हितवादी तथा मनो- रंजन कलकत्ता से बंगला संवत् १३१७ में प्रकाशित हुआ। इसमें अनुवादक का नाम नहीं दिया गया है। सातवें तरंग का अनुवाद बंगला में दुर्गानाथ शास्त्री ने सन् १९११ ई० बंगला संवत् १९१८ में किया। आठवें तरंग का बंगला अनुवाद सर्व श्री राम चरन तथा दुर्गानाथ शास्त्री ने सन् १९१२ ई० में चटगांव निवासी हीरा लाल चट्टोपाध्याय ने कल्हण की राज तरंगिणी का अनुवाद बंगला में प्रकाशित किया। इसका अनुवाद श्लोकानुसार नहीं है। एक मत है कि वह जोगेश चन्द्रदत्त के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है। सन् १९२९ में श्री माधव वेंकटेश लेले श्री स्टीन के अनुवाद के आधार पर मराठी में अनुवाद पूना से प्रकाशित किया। श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने आठो तरंग का अंग्रेजी अनुवाद सन् १९३५ में किया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६८ में हो गया है। श्री विश्वबन्धु शास्त्री ने सर्वश्री भीम देव, के. एम. रामास्वामी शास्त्री तथा ए. भास्करम् नायर के सहयोग से सम्पादित कर प्रथम से सप्तम तरंग मूल, पाठभेद के सहित प्रथम खण्ड सन् १९६३ ई० में विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान से प्रकाशित किया। वही पाठ प्रस्तुत ग्रन्थ का रखा गया है। इसका दूसरा खण्ड अर्थात् आठवां तरंग वहीं से प्रकाशित किया गया है। श्री गोपी कृष्ण शास्त्री ने सन् १९४१ ई० में प्रथम से सात तरंगो का हिन्दी अनुवाद किया है। यह अनु- वाद काशी से प्रकाशित हुआ है। सन् १९६० में श्री राम तेज शास्त्री पण्डित पुस्तकालय, काशी ने मूल के साथ हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया। श्री नीलम अग्रवाल ने हिन्दी अनुवाद सन् १९६८ ई० में किया है। सन् १९६९ ई० इस लेखक ने काश्मीर कीर्तिकलश शीर्षक प्रथम से तीन तरंगों का अनुवाद किया है। नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ने इसे प्रकाशित किया है। द्वितीय खण्ड तरंग ४ से ७ का हिन्दी अनुवाद भी मुद्रण की स्थिति में है। अन्य सभी ग्रन्थों का आधार एक भाग कल्हण की राजतरंगिणी है। इस प्रकार गत ९ शताब्दियों से राज तरंगिणी का अध्ययन, अध्यापन एवं लेखन कभी बन्द नहीं हुआ है और जबतक इतिहास की ओर जगत् की रुचि रहेगी कभी बन्द नहीं होगा।