राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५७७ गव्यूतिमात्रमासन्ने देवीधामनि धैर्यवान् । धुन्वन् कराभ्यां मधुपान् धावति स्म स धीरधीः ॥४०७॥ ४०७. देवी मन्दिर के गव्यूति मात्र शेष रह जाने पर धीरधी एवं धैर्यशाली वह हाथों से मधुपों (भ्रमरों) को हटाते हुए दौड़ने लगा । अथ स्नाय्वस्थिशेषाङ्गो लूनमांसः षडङ्घ्रिभिः । कराभ्यामक्षिणी रक्षन् देव्यायतनमापदत् ॥४०८॥ ४०८. अनन्तर स्नायु एवं अस्थि मात्र शेष षट्चरणों (भ्रमरों) से खण्डित मांस वाला हाथों से आँखों की रक्षा करते हुए देवी आयतन में पहुँचा । प्रशान्ते भृङ्गसंपाते प्रकाशमवलोकयत् । स देव्याः पादयोरग्रे पपातोद्भ्रान्तजीवितः ॥४०९॥ ४०९. भृंग (भ्रमर) संपात (गिरना—आक्रमण) शान्त होने पर उद्भ्रान्त जीवित (प्राण शंकित) प्रकाश देखते हुए वह देवी के चरणों के गिर पड़ा । स्तोकावशेषप्राणं तं देव्याश्वासयितुं ततः । अभिरामं वपुः कृत्वा प्रस्पर्शङ्गेषु पाणिना ॥४१०॥ ४१०. तदनन्तर देवी ने स्वल्प अवशिष्ट प्राण वाले उसे अभिराम शरीर प्रदान कर आश्वासन.हेतु, अंगों पर पाणि-स्पर्श किया । दिव्येन पाणिस्पर्शेन तेन पीयूषवर्षिणा । स क्षिप्रासादितस्वास्थ्यो दिक्षु चिक्षेप चक्षुषी ॥४११॥ ४११. उस पीयूषवर्षी दिव्य पाणि स्पर्श से वह शीघ्र ही स्वास्थ्य प्राप्त कर दिशाओं में उसने दृष्टिपात किया । प्रविष्टमात्रः प्रैक्षिष्ट सिंहविष्टरसीम्नि याम् । घोराकारां स तां देवीं तदाऽद्राक्षीन्न तां पुनः ॥४१२॥ ४१२. उस समय प्रवेश करते ही उसने सिंह विष्टरासीन घोराकृति जिस देवी को देखा, उसे पुनः नहीं देखा । ददर्श पुनरुद्यानलतावासे विलासिनीम् । स्थितां पुष्करिणीतीरे श्यामां पुष्करलोचनाम् ॥४१३॥ ४१३. (उसने) पुष्करिणी तट पर उद्यान लता गृह में विलासिनी, पुष्करलोचनी श्यामा स्त्री (षोडश वर्षीया) को स्थित देखा । ७३