भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 767

५८२ राजतरंगिणी रतिसेनामिधश्चोलराजः सज्जोऽब्धिपूजने । तां तरङ्गान्तरान्लेभे रत्नराजिमिवोज्जलाम् ॥४३२॥ ४३२. समुद्र पूजन में लग्न चोलराज¹ रतिसेन ने तरङ्गमध्य से उज्ज्वल रत्नराशि तुल्य उसे प्राप्त किया था । आ बाल्याद्व्यक्तदिव्योक्तिं तामलंकृतयौवनाम् । दिव्यार्हा पृथिवीशेभ्यो नार्थिभ्योऽपि ददौ नृपः ॥४३३॥ ४३३. बाल्यपन से ही दिव्य लक्षणों से युक्त एवं यौवन से अलंकृत करते उस दिव्या- र्हा (दिव्य पुरुष के योग्य) को नृपति ने प्रार्थी पृथिवीशों (राजाओं) को भी नहीं प्रदान किया। रणादित्यनृपामात्ये दूत्यायाते तथैव तम् । प्रत्याख्यानेच्छुमाचख्यौ सैव तद्वरणं वरम् ॥४३४॥ ४३४. राजा रणादित्य के दूतरूप में आये अमात्य को भी पूर्ववत् प्रत्याख्यान के लिए इच्छुक (पिता से) उसने (कन्या ने) ही उसी का वरण श्रेष्ठ कहा। तदर्थमेव कथितस्वोत्पत्तिं तां ततः पिता । द्रुतं कुलूतभर्तुः सुहृदः प्राहिणोद् गृहम् ॥४३५॥ ४३५. उसी के निमित्त अपनी उत्पत्ति कहने पर पिता ने उस (कन्या) को¹ शीघ्र ही सुहृद् कुलूत पति² के गृह प्रेषित कर दिया । प्रहृष्टोऽविप्रकृष्टं तं देशं गत्वा न्यधत्त ताम् । परिणीय रणादित्यः शुद्धान्तस्याधिदेवताम् ॥४३६॥ ४३६. दूरस्थ उस देश में बिना गये ही प्रसन्न रणादित्य ने उसे परिणीत कर अन्तः- पुर में (अधिदेवता) प्रधान रानी बना दिया । पादटिप्पणियाँ : वैवाहिक सम्बन्ध था । शशि शेखर तथा राजाधिराज ४३२ (१) चोल : पाद टिप्पणी त० १ : चोल का विवाह कश्मीर की राजकन्याओं से १०० पृष्ठ द्रष्टव्य है । हुआ था । पादटिप्पणियाँ : (२) कुलूत : यह हिमाचल प्रदेश कुल्लू ४३५ (१) कन्या : दक्षिण में एक आख्यायिका प्रदेश के लिये आया है जो ब्यास किंवा विपासा प्रचलित है । चोलराज तथा कश्मीरराज में नदी का ऊर्ध्वभाग स्थित भूखण्ड है । बृहद् संहिता से भी यही बात स्पष्ट होती है ।