राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] परिशिष्ट घ २७
रेस’ का ‘गोरगोन मेडूसा’ तथा ईरान में ‘फरदियम’ का ‘अजोदहक’ के साथ संघर्ष के दिखाये गये हैं । अथर्व वेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषद्, गृह्य सूत्र में नाग पूजा को उल्लेख मिलता है । वे एक जाति रूप में चित्रित किये गये हैं । विष्णु धर्मोत्तर पुराण अन्य जातियों के साथ नाग जाति का उल्लेख करता है । ( १ : ६ : ६ ) मत्स्य पुराण ‘बहुतरनागजातय.’ अर्थात् नागों की बहुत जातियाँ थी, वर्णन करता है ( १५४ . ४६२ ) पद्म पुराण तथा हरिवंश पुराणों में उल्लेख आता है । पृथु के पूर्व नाग पृथ्वी का दोहन करते थे । ( पद्मपुराण भूमिखण्ड २८ : ४५ तथा हरिवंश: १ : ७ : २६-२७ ) । वृत्र शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है । शाब्दिक अर्थ है—‘ध्यान्तारंदानवा वृश्रा ’—अर्थात् वृत्रासुर, अन्धकार, शत्रु । वृत्रासुर इन्द्र संग्राम की कथा प्रसिद्ध है । इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया था । अपनी रक्षा के लिये वृत्र ने अहि का रूप धारण कर लिया था । शतपथ ब्राह्मण में वृत्र को सर्प तथा दानव कहा गया है । कश्यप के दनुनाम्नी पत्नी द्वारा उत्पन्न पुत्रों का नाम दानव है । शतपथ ब्राह्मण में वृत्र का नाम सर्प दिया गया है । मुझे नेपाल यात्रा में सर्प जाति के लोगों से सम्पर्क हुआ था । पहले नाम सुना तो कुछ आश्चर्य हुआ । सर्प जाति के लोग अच्छे, सुन्दर मनुष्य जैसे थे । उनकी जाति का सर्प क्यो पड़ गया, मैने पूछा वे स्वयं नहीं बता सके । किन्तु उनके पास रहने से मैने अनुभव किया सर्प किंवा नाग का उनके मन में उच्च भाव है । मैं समझता हूँ किसी समय सर्प की उपासना करने के कारण, उन्हें सर्प पूजक कहा गया था । किंवा सर्प विद्या में वह जाति निपुण होगी । अतएव उनका नाम सर्प में दिया गया । सम्भव है वह नाम काला- न्तर में कर्मवाचक से जातिवाचक हो गया । नाग शब्द, साप, सर्प, कीरा के सामान्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है । एक और सम्भावना हो सकती है । किसी पर्वतीय जाति का प्रतीक किंवा चिन्ह सर्प अथवा नाग रहा था । उस प्रतीक किंवा चिन्ह के कारण नाग शब्द जातिवाचक हो गया । नाग प्राणी हैं । वे मनुष्य हैं । और रेंगने वाले जीव भी हैं ? फर्गुसन ने नाग जाति को तुरानी अर्थात् तुरान देशीय किंवा तुरान वंशीय कहा है । तुरानी तथा आर्यों की एक ही परम्परा थी । यहू तथा द्रविड जाति मूलतः नाग अर्थात् सर्प पूजक नही थे । वे उत्तरो भारत निवासी थे । आर्यों ने उन्हें जीता था । ( ‘ट्री एण्ड सरपेण्ट वरशिप’ पृष्ठ ६०, ६१ ) । कनिंघम ने नाग जाति को ड्रेगन अर्थात् नाग पूजक माना है । उनकी गणना ‘शक’, ‘मीडिया’ तथा ‘जोहक’ की श्रेणी में की है । तीन अत्यन्त प्राचीन मुद्राओं पर सर्प टंकित मिलता है । उस पर पुरानी ब्राह्मी लिपि में ‘काटस’ अंकित है । उन्हें पश्चिमी पंजाब मे पाया गया था । यह प्रारम्भिक ‘तख्खस’ थे । नाग जाति का तक्षक राजा माना जाता है । उन्हों के उत्तराधिकारी थे । उन्हें ‘काद्रवेय; किंवा ‘कुद्रव’ कहा जाता था । ( वे कद्रू की सन्तान थे । कनिंघम ए० एम० आर० भाग २ : पृष्ठ १० ) कर्नल टाड के अनुसार नाग जाति शेषनाग देश से आई थी । यह देश सम्भवतः स्काईथिक अर्थात् स्टार्बो वर्णित तोखरी है । तोखरो शब्द-संज्ञा तुर्की के लिए व्यवहृत की गयी है । वे शकद्वीप में राज्य करते थे। चीनी उन्हें ‘तक ई उक्म’ कहते थे । वर्तमान ताजिन के ताजिक थे । ( एनाल्स एण्ड एण्टी क्विटींज आफ राजस्थान पृ० ४५ ) थीपाजिटर ने उन्हे मानव, सोयुम तथा एल ( चन्द्रवंश ) से भिन्न नहीं माना है । उन्हें क्षत्रियो की परम्परा में विरोधी तथा पर जाति कहा है । दैत्य, दानव, नाग एवं राक्षस सर्वथा मानव से विरुद्ध थे नही माना है । (पाजिटर ए० आई० एच० टी० पृ० २९०) ५०