राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ राजतरंगिणी कारहलेयले ( CORLLTALE ) का मत है कि असुर तथा नाग जातियां संस्कृति तथा सभ्यता की दृष्टि से अत्यन्त प्राचीन जाति थी । ये आर्यवंशीय थे । (कारलेयले : ए. एस. आर. भाग ६ : पृष्ठ ४, ५) नाग भारत में असुर जाति की रीढ तथा शक्ति थे । नागों के पतन के पश्चात् भारत में संगठित असुर जाति का पतन हो गया । ( बैनर्जी-शास्त्री . असुर इण्डिया पृष्ठ ६६ ) सी० ए० वी० बैनर्जी ने असुरों की एक शाखा को नाग जाति माना है । डाक्टर ग्रियर्सन का मत है कि नाग जाति अनार्य थी । हुंजा नगर के निवासी थे । हुंजा गिलगिट क्षेत्र कश्मीर में है । यह एक रियासत थी । इस समय पाकिस्तान में है । उनकी मूल भाषा का पता नहीं चल सका है । भारत में विभिन्न नागा किंवा नाग जाति कही जाने वालों की भाषाएँ एक नहीं हैं । उनमें भिन्नता है । उनकी भाषा कुरुशस्की थी । यह भाषा किस वर्ग में आती है । अभी निश्चय नहीं किया जा सका है । (ग्रियर्सन . पैशाची, पिशाच एण्ड मार्डन पिशाच इन. जेड. डी. एम. जी. भाग ६६ : पृष्ठ ७२ ) श्री सी० एफ० ओल्डिम का मत है । नाग जाति सूर्य पूजक थी । उनकी भाषा संस्कृत थी । उनकी जाति का चिन्ह किंवा प्रतीक नाग का फण था । इसी प्रतीक अथवा चिन्ह के कारण इस जाति की संज्ञा नाग जाति हो गयी थी । (ओल्डम सरपेण्ट वरशिप इन इण्डिया इन एन. आर. ए. एस० १८९१ पृष्ठ ३९१) श्री सी० एस० वेक का मत है । नागा आदिम यानी नाग पूजक थे । ( श्री सी० एस० वेक : सर- पेण्ट वरशिप एण्ड अदर एसेज : पृष्ठ ९१ ) प्रोफेसर हापकिन्स का मत है । गरुड और तार्क्ष्य पश्चिमी घाट के मानव सरदार थे । ( होपकिन्स : इपिक मैथोलोजी पृष्ठ २३ ) श्री. एल. वी. केनी ने 'नापाज इन मगध' के लेख में मत प्रकट किया है । ये द्रविड़ वंशीय जाति के मानव थे । अर्यट के भारत आगमन के पूर्व उत्तरीय भारत में रहते थे । ( जे बी. ओ. आर. एसः भाग २८ पृष्ठ १६३ ) श्री ए. सी. दास का मत है । नाग जाति आर्यों की ही एक शाखा है । ( ए सी. दासः ऋग्वैदिक कल्चर पृष्ठ १६७ ) श्री. एन. जे शिन्दे का विचार है । नाग आर्य जाति के नही थे । क्योकि ये प्रायः आर्यों के विरोधी प्रतीत होते हैं । अथर्ववेद में सर्पों का उल्लेख जिस प्रकार किया गया है उसमे कोई बात सन्तोषप्रद रूप से स्पष्ट नहीं होती । नागों का नाम अधिकतया अनार्य प्रतीत होता है (श्री एन. जे. शिन्दे, पूनाः दि फाउण्डेशन आफ अथर्ववैदिक रिलीजन पृष्ठ ९:२०० ) पाश्चात्य विद्वानो के विवेचनात्मक ऐतिहासिक मतों के पश्चात् भारतीय पुरातन साहित्य में नाग जाति का रूप क्या था इस विषय पर प्रकाश डालना उचित होगा । अनेक मतों के बीच नागा जाति स्वयं एक समस्या बन गयी है । उल्लेख कर चुका हूँ । नाग जाति तथा शब्द का प्रयोग वेद में नहीं किया गया है । नाग के स्थान पर दानव वृत्र का उल्लेख मिलता है : त्वं ताँ इन्द्रो भयां अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर । वधीर्वनेव सुधितेभिरत्कैरा पृथ्वु दर्पि नृणां नृतम ॥ शतपथ ब्राह्मण में दानव तथा सर्प की संज्ञा वृत्र से दी गयी है । ( १६ : ३ : ९१ ) 'तस्माद् वृत्रोश्य मद यास्स मभ्यत स्यादहिस्तं दनेश्च दनायूश्च मातेव च परिजगृहुस्तस्माद्दा- नव इत्याहु- ।'