भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२८ राजतरंगिणी कारलेयले (CORLLTALE) का मत है कि असुर तथा नाग जातिया संस्कृति तथा सभ्यता की दृष्टि से अत्यन्त प्राचीन जाति थी । वे आर्यवंशीय थे । (कारलेयले · ए. एस. आर. भाग ६ : पृष्ठ ४, ५) भाग भारत मे असुर जाति की रीढ तथा शक्ति थे । नागों के पतन के पश्चात् भारत मे संघटित असुर जाति का पतन हो गया । (वैनर्जी-शास्त्री . असुर इण्डिया पृष्ठ ६६) श्री ए० बी० वेनर्जी ने असुरो की एक शाखा को नाग जाति माना है। डाक्टर ग्रियर्सन का मत है कि नाग जाति अनार्य थी। हुंजा नगर के निवासी थे । हुंजा गिलगिट क्षेत्र कश्मीर मे है। यह एक रियासत थी। इस समय पाकिस्तान में है। उनकी मूल भाषा का पता नही चल सका है। भारत में विभिन्न नागा किंवा नाग जाति कही जाने वालो की भाषाऐं एक नही हैं। उनमें भिन्नता है। उनकी भाषा कुरुशस्की थी। यह भाषा किस वर्ग में आती है। अभी निश्चय नही किया जा सका है। (ग्रियर्सन : पैशाची, विश्राच एण्ड माडर्न पिशाच इन. जेड. डी. एम. जी. भाग ६६ · पृष्ठ ७२) श्री सी० एफ० ओल्ड्हिम का मत है । नाग जाति सूर्य पूजक थी । उनकी भाषा संस्कृत थी । उनकी जाति का चिन्ह किंवा प्रतीक नाग का फण था। इसी प्रतीक अथवा चिन्ह के कारण इस जाति की संज्ञा नाग जाति हो गयी थी । (ओल्डम · सरपेण्ट वरशिप इन इण्डिया इन एच. आर. ए. एस० १८९१ पृष्ठ ३९१) श्री सी० एस० वेक का मत है । नागा आदिम वासी नाग पूजक थे । (श्री सी० एस० वेक : सर- पेण्ट वरशिप एण्ड अदर एसेज : पृष्ठ ९१) प्रोफेसर हापकिन्स का मत है। गरुड और तार्थ्य पश्चिमी घाट के मानव सरदार थे । (होपकिन्स : इपिक भैथोलोजी पृष्ठ २३) श्री. एल बी. वेनी ने 'नागाज इन मगध' के लेख में मत प्रकट किया है। वे द्रविड़ वंशीय जाति के मानव थे । अर्यट के भारत आगमन के पूर्व उत्तरीय भारत मे रहते थे। (जे. बी. ओ. आए. एस: भाग २८ पृष्ठ १६३) श्री ए. सी. दास का मत है। नाग जाति आर्यो की ही एक शाखा है। (ए सी. दासः ऋग्वैदिक कल्चर पृष्ठ १६७) श्री. एन. जे शिन्दे का विचार है। नाग आर्य जाति के नही थे । क्योकि ये प्रायः आर्यों के विरोधी प्रतीत होते हैं। अथर्ववेद मे सर्पों का उल्लेख जिस प्रकार किया गया है उससे कोई बात सन्तोषप्रद रूप से स्पष्ट नहीं होती। नागों का नाम अधिकतया अनार्य प्रतीत होता है (श्री एन. जे. शिन्दे, पूना दि फाउण्डेशन आफ अथर्ववैदिक रिलीजन पृष्ठ ९:२००) पाश्चात्य विद्वानों के विवेचनात्मक ऐतिहासिक मतों के पश्चात् भारतीय पुरातन साहित्य में नागं जाति का क्या रूप था इस विषय पर प्रकाश डालना उचित होगा। अनेक मतों के बीच नागा जाति स्वयं एक समस्या बन गयी है। उल्लेख कर चुका हूँ। नाग जाति तथा शब्द का प्रयोग वेद में नही किया गया है। नाग के स्थान पर दानव वृत्र का उल्लेख मिलता है : त्वं ताँ इन्द्रो मयां अमित्रान्दासा वृथाण्वार्या च शूर । वधीर्वनेव सुधितेभिरर्केः पृथु दर्प नृणां नृतम ॥ शतपथ ब्राह्मण में दानव तथा सर्प की संज्ञा वृत्र मे दी गयी है। (१६:३:९।) 'अस्माद् वृत्रोऽय मद द्वाग्य मग्नन्त श्याहं'हस्तं दनेरषु दनापूरव मानेव च परिरगृह्णन्तममाहा- न्व इयाद्।'