राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग ११ से लिया है। निष्कर्ष निकलता है। कल्हण ने, जैसा वह स्वयं लिखता है, नीलमत पुराण का गंभीर अध्ययन किया था। कल्हण ने नील का पुनः उल्लेख प्रथम तरंग की श्लोक संख्या २८, १८० में, नील कुण्ड का १८३, १८५ में, कर्मकाण्ड, पंचम तरंग संख्या ९१ में नीलजा (वितस्ता) नदी, नीलभू. सरिता अर्थात् वितस्ता या झेलम नदी का नीलकुण्ड में पूजा का तरंग ८-३३५, में उल्लेख किया है। नीलमत पुराण कथन का उल्लेख कल्हण ने राज- तरंगिणी के 'तरंग १:१४ में, लुप्त राजाओं का उल्लेख १:३६ में; नीलमत पुराण के श्लोक का उद्धरण १:७२ में, किया है। ज्येष्ठेश की कथा १:११३ में, सोदर तीर्थ का वर्णन उद्धरण १:१२३ में, बौद्धों द्वारा नील पुराण के कर्मों का बन्द करना १:१७८ में, पिशाचो की कथा १:१८४ में, काश्मीर के तीर्थों तथा सतीसर की कथा आदि नीलमत पुराण से लिया है। नीलमत पुराण उपलब्ध है। कल्हण ने नीलमत पुराण, नील मुनि तथा नील सम्बन्धी जिन बातो का उल्लेख राजतरंगिणी में किया है, वे सब नीलमतपुराण में मिलते हैं। नीलमत पुराण के श्लोकों का उद्धरण राजतरंगिणी में मिलता है। कल्हण ने इसे स्वयं राज- तरंगिणी में स्वीकार किया है। उन्हें उसने नीलमत पुराण से लिया है। कल्हण नीलमत पुराण की सत्यता तथा प्राचीनता सिद्ध करता है। प्राप्य नील- मत पुराण कल्हण की सत्यता भी सिद्ध करता है। साथ ही साथ नीलमत पुराण से जो लेना स्वीकार करता है, वे नीलमत पुराण में मिलते हैं। नीलमत पुराण का अध्ययन करने पर मेरी प्रथम प्रतिक्रिया यह हुई कि नीलमत पुराण वास्तव में काश्मीर का भूगोल है। काश्मीर के पर्वतों, नदियों, जलाशयों, तीर्थों, देवस्थानों, उपत्यकाओं, झरनो आदि, का 'विशद वर्णन पुराण करता है। उसमें वर्णित स्थान, नदियों, स्रोतस्विनियाँ, पर्वतशिखर, पर्वतमालाएँ, जलाशय, तीर्थ तथा देवस्थान आज भी अपने मूल अपभ्रंश किंवा परिवर्तित नामों के साथ जहाँ जिस स्थान पर उनका होना कहा गया है, मिलते है। उनकी दिशा, उनके समीप के वर्णित प्राकृतिक भौगोलिक स्थान, यथास्थान मिलते है। मैंने स्वयं भ्रमण कर स्थानो का पता लगाया है। बहुत से स्थान लोप हो गये हैं। लोग भूल गये हैं। कुछ को मैने इन्हें नीलमत के आधार पर खोजा है। उन्हे यथास्थान पाया है। यद्यपि लंबे काल और मुस्लिम प्रभाव के कारण पुराने नामो तथा ख्याति को लोग भूल गये है। नीलमत पुराण के रचनाकार ने काश्मीर मंडल का भ्रमण कर आँखो देखा वर्णन किया है। दूसरी बात और उल्लेखनीय है। नीलमत पुराण काश्मीर की प्राचीन परम्परा, इतिहास, धर्म, आचार, विचार, मतमतान्तर, कर्मकांड, सामाजिक जीवन, पूजा-पाठ, रहन-सहन, का सजीव चित्रण करता है। निस्संदेह तत्कालीन समाज का वास्तविक चित्र आंखो के सम्मुख आ जाता है। नीलमत पुराण में वर्णित स्थानो, उपस्थानों को, मूल श्लोको से मिलाकर अध्ययन करने से वास्तविकता पर प्रकाश पडता है। हुएन साग और नीलमत पुराण पर द्रष्टव्य है परिशिष्ट। चीनी पर्यटक हुएनसाग ने काश्मीर की यात्रा की थी। कल्हण से शताब्दियो पूर्व आया था। उसने नीलमत द्वारा वर्णित काश्मीर के इतिहास तथा कथाओ का उल्लेख किया है। निस्संदेह तत्कालीन काश्मीर में नीलमत पुराण के प्रचलित होने की पुष्टि करता है। कल्हण के वर्णन की सत्यता सिद्ध करता है। कल्हण ने यथेष्ट ऐतिहासिक सामग्री राजतरगिणी की रचना में नीलमत पुराण से ली है। कल्हण द्वारा उल्लिखित कम से कम दो बातें हुएनसांग के पर्यटन वर्णन में मिलती है। हुएनसाग ने उन्हें तत्कालीन प्रचलित संस्कृत ग्रन्थों से लिया