भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 869

६२ राजतरंगिणी शकराजाओं की संख्या १६ दी गयी है। इनका उल्लेख ( १ : ६३ : १२०-१२४ ; ३ : ७३ : १०८; ३ : ७४ : १३७; १७२-१७५ ) में आता है। स्कन्दपुराण ( १ : २ : ४० ) में वर्णन आता है कि कलियुगारम्भ होने पर एक लाख एक सौ वर्ष तक शकराजा होगे। संस्कृत साहित्य में चतुर्द्वीप, सप्त द्वीप, नव द्वीप, द्वादश द्वीप, त्रयोदश द्वीप, अष्टादश द्वीपो का उल्लेख मिलता है। पुराणों में सातो द्वीपो को समुद्रों से घिरा बताया गया है। वायु तथा अन्य पुराणों में क्रम, जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्करादि द्वीपों की तालिका दी गयी है। मत्स्य पुराण में जम्बू, शरु, कुश, क्रौंच, शाल्मली, गोमेध ( प्लक्ष ) और पुष्कर सात द्वीपो का उल्लेख किया गया है। क्षीरसागर को क्षीरोद भी कहते हैं। वर्तमान उत्तर अतलान्तिक महासागर के पश्चिमोय भाग तथा आर्कटिक समुद्र को कुछ विद्वान् क्षीर सागर कहते हैं। विद्वान् वडेर क्षीर सागर को कैस्पियन सागर तथा विल्फर्ड उसे जर्मन समुद्र कहते हैं। क्षीर अर्थात् दूध का रंग उज्ज्वल होना है। उत्तर आर्कटिक सागर तुषार पात के कारण श्वेत रूप धारण कर लेता है। कास्पियन सागर भी शिशिर ऋतु मे जमकर श्वेत रूप हो जाता है। यह बात भारतीय महासागर तथा उससे सम्बन्धित सागर एवं खागात के सम्बन्ध में लागू नहीं होती। उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में होने के कारण वे कभी जमते नही। कैस्पियन सागर तथा आर्कटिक सागर दूध की तरह जमकर श्वेत रूप शिशिर ऋतु में धारण कर लेते हैं। मालूम होता है कि यहा क्षीर सागर नाम कैस्पियन सागर के लिए प्रयोग किया है। शक द्वीप को क्षीर सागर से घिरा हुआ कहा गया है। प्रत्येक द्वीप मे ७ पर्वत, ७ वर्ष तथा ७ नदियों का उल्लेख किया गया है। सप्त सिन्धु, सप्त वर्ष, सप्त पर्वत, सप्त ऋषि, सप्त द्वीप, सप्त नदी, सप्तगंगा, सप्त पुरी, सप्त वासर, आदि सप्त संख्या देने की एक शैली किंवा परम्परा प्राचीन काल में चल गयी थी। सम्भव है कि सप्त के आधार पर सम्भवतः लोकप्रिय बनाने तथा स्मृति में चिरस्थायी रखने के लिए एक उपाय निकाला गया होगा। पर्वतादि के वर्णन में द्विनाम देने की प्रथा थी। एक ही पर्वत के दो नाम होते थे। शक द्वीप के सप्त पर्वत है यथा—( १ ) मेरु-उदय ( पामीर ), ( २ ) जलधारा-चन्द्र ( वोल्गा नदी का पठार ) ( ३ ) दुर्ग-शैल-नारद ( कैस्पियन द्वार ), ( ४ ) श्याम-दुन्दुभी ( उत्तरीय पर्वतमाला ), ( ५ ) अस्तगिरि- सोमक ( ६ ) आम्बिकेय-सुमन, ( ७ ) विभ्राज-केशव ( जगरास पर्वत )। वायु पुराण मे केशव का रम्या तथा वैशारी पर्वत नाम से उल्लेख किया गया है। शक द्वीप के सात वर्ष है। उक्त सातों पर्वतो के नाम पर दिये गये है अथवा उन पर्वतो के मूल तथा उपत्यका में ये : (१) उदय वर्ष ( उदय पर्वत ), (२) सुकुमार-शिशिर ( जलधार पर्वत वोल्गा नदी की उपत्यका ) ( ३ ) कौमारः सुखोदय ( दुर्ग शैल ) (४) मणि चक्र-आनन्दक ( श्याम पर्वत जरफशा नदी की उपत्यका ) (५) कुसुमोत्कर-असित ( सोमकपर्वत ) यूनानी लेखको का कोमी दोहि प्रदेश ) ( ६ ) मैनाक- क्षेमक ( आम्बिरेय पर्वत ) (७) विभाज-ध्रुव ( विभ्राज पर्वत ) । शक द्वीप की सप्त नदियाँ हैं : (१) सुकुमारि = मुनितमा (२) कुमारी = तप सिद्धा (३) नन्दा पावनी (४) विविधा = द्विविधा (५) इक्षु = कुहु = वक्षु = आमू दरया (६) वेणुका = अमृता (७) सुकृता= गभस्ति । महाभारत में शक द्वीप की सात नदियां (१) सुकुमारी = (वोल्गा) (२) कुमारी (कुभा) (३) सीता (गीरदरया) (८) कावेरशा (५) महानदी (हान नदी) (६) कोरम्ब, (७) मणि जला (जरफशा नदी) दिया गया है। यूनानियों के सोथियन शक तथा चीनियों की यू-ये-चि० (ऋषिक) जाति पामीर (मेरु) से कास्पि- यन ( कश्यप ) सागर तक फैली थी ।