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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 917

१०८ राजतरंगिणी इस मत की पुष्टि भागवत पुराण (१० : ६३ : १०-११) से होती है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने धनुष के तीखे नोकवाले बाणो से शंकर जी के अनुचरों-भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, बेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड एवं वज्रराक्षसों को मार कर खदेड़ दिया था। पिशाच शंकर के अनुचर थे। शंकर की सेना में थे। श्रीकृष्ण तथा शंकर के युद्ध में शंकर के पक्ष से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया था। भागवत पुराण (१२ ३ : ४०) में कलियुग काल की समानता पिशाचों से करते हुए कहा गया है—'कलियुग में प्रजा शरीर ढँकने के लिए वस्त्र, पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए रोटी, तृष्णा तृप्त करने के लिए जल, शयन निमित्त २ हाथ भूमि से भी वंचित हो जाती है। उसे दाम्पत्य जीवन, स्नान, आभूषण, पहनने तक की सुविधा नहीं रहती। लोगों की आकृति प्रकृति तथा चेष्टाएँ पिशाचों के समान हो जाती हैं।' स्कन्द पुराण काशी खण्ड के पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध दो भाग हैं। उत्तरार्द्ध में पिशाच का वर्णन आता है। काशी में पिशाच मोचन तीर्थ है। इसमे पिशाच के सम्बन्ध में एक कथा दी गयी है। यह स्कन्द, कुम्भज तथा पिशाच के प्रश्नोत्तर रूप में है। कर्पटीश्वर में एक तपस्वी थे। वे हेमन्त ऋतु में एक समय कर्पटीश्वर लिंग के समीप पूजा कर रहे थे। उन्हें विमलोदक कर्पटीश्वर सरोवर के तट पर एक भयंकर मूर्ति का दर्शन हुआ। भयंकर मूर्तिधारी पिशाच ने सानुनय तपस्वी से कहा—प्रतिष्ठान नामक एक देश है। मैं यहाँ का तीर्थ पुरोहित था। वृक्ष-जलहीन मरुस्थल में बहुत समय व्यतीत किया। तीर्थों में दान लेने के कारण पिशाच योनि में जन्म हुआ। मैंने मरुभूमि में एक बालक को देखा। मैं उसके शौचहीन, सन्ध्या कर्मविहीन देह में भोगेच्छा के कारण प्रविष्ट हो गया। वही बालक कनकाशा से काशी आया। काशी में पिशाच का प्रवेश नही हो सकता था। मुझे बालक का शरीर त्यागना पड़ा। मैं उस बालक की प्रतीक्षा में काशी के बाहर बैठा था। मैने एक काषायधारी संन्यासी देखा। इच्छा हुई। उसे मारकर अपनी क्षुधा शान्त करूँ। उसने शिव का नामोच्चारण किया। शिव का नाम कान में पड़ते ही मेरे पूर्व संचित पाप धुल गये। मैं काशीपुरी में प्रवेश करने योग्य हो गया। संन्यासी के साथ अन्तर्गृहो की सीमा में पहुँचा। संन्यासी ने भी भीतर प्रवेश किया। मैं यहाँ रुका। तपस्वी ने पिशाच को कर्पटीश्वर तीर्थ म स्नान करने के लिए कहा। उत्तर दिशा जलाधिष्ठाता देव उसको सर्वदा रक्षा करते थे। अतएव वह स्नान करने में असमर्थ हुआ। तपस्वी ने उसे भस्म लगाकर स्नान करने के लिए कहा। भस्म धारण कर पिशाच ने स्नान किया। वह दिव्य देहधारी हो गया। 'उस दिन से उस तीर्थ का नाम पिशाच मोचन तीर्थ हो गया। उसने कहा। यहां स्नान करने से पिशाच योनि छूट जायगी। यहां श्राद्ध करने से पितर उत्तम योनि को प्राप्त होगे। अगहन सुदी चतुर्दशी के दिन पिशाच मोचन में स्नान करने वाले कभी पिशाच योनि को प्राप्त नही होंगे। इस कथा से दो बातें सिद्ध होती हैं। पिशाच से दिव्य मनुष्य हुआ जा सकता है। उसके लिए शिव की आराधना तथा भक्ति आवश्यक है। भस्म धारण करना शैव धर्म का सबसे बड़ा चिह्न है। भस्म धारण करने के पश्चात् अर्थात् शैवमत ग्रहण करते ही पिशाच पापों से मुक्त हो जाता है। उसके लिए अपना आच- रण बदलना आवश्यक होता है। यहां स्नान, नरमांस भक्षण तथा पितृ श्राद्ध तीन बातों पर जोर दिया गया है। पिशाच अफ्रीका की अनेक मानव जातियों की तरह मांस भक्षण करते थे। स्नान न करने के कारण गन्दे रहते थे। तथा पितृ श्राद्ध को नहीं मानते थे। इन तीनों कर्मों के त्याग पर पुनः दिव्य मनुष्य योनि प्राप्त कर

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