राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
DevanagariHindipublished984 पृष्ठ
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१४४ राजतरंगिणी
| पाद / श्लोकांश | तरंग, श्लोक | पाद / श्लोकांश | तरंग, श्लोक |
|---|---|---|---|
| देश्यैकदेशाल्लोनेभ्निः | ३, १० | नर्मभ्रंशं भंगे शान्तो | ३, १५३ |
| देहत्यागोयतोऽप्यासीत् | ३, ३९३ | न कया शान्ति दृशि | ३, ४४ |
| दोःस्तम्भसंभृतासक्तो | ३, ९८ | नररात्रोविगाणारे | २, ११८ |
| द्रक्ष्यस्यावामपि सदा | १, २२१ | नगोद्धृतवतो देशं | १, १९० |
| द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं | २, ९५ | नावतारमुहन्ति तैः | ३, २५२ |
| द्वयोरालोकितं चित्रं | ३, ६१ | नशोषिता वारिपत्नी° | २, ७३ |
| द्वापञ्चाशतमब्दान्दमा | १, ३३७ | नाष्ट्य गंजंगतेश्या | २, १६ |
| द्वापञ्चाशतमाम्नाम | १, १६ | नागेष वरदा विद्या | ३, १५९ |
| द्वारादिषु प्रदेशेषु | १, १२२ | नानाजलाशयाकीर्णे | ३, २२८ |
| द्विजोऽपि कौतुकाकृष्टः | १, २२३ | नानादिग्भ्यश्चाह्वानं | ३, १२९ |
| द्वेयो नामेण दुर्धर्षो | ३, ५२० | नानाविरुद्वगपरिमर्शः | १, ३७० |
| [ ध ] | नान्यग्रहीदुपाहार | १, ३५३ | |
| धन्यास्ते पृथिवीपाला. | २, ४२ | नास्त्युपायः स संसारे | २, ६६ |
| धर्माध्यक्षो धनाध्यक्ष. | १, ११९ | नास्म चिन्तामणि दत्तो | ३, १६५ |
| धर्मारण्यविहारान्त | १, १०३ | निगूढदारदौरात्म्य° | ३, ५०६ |
| धाष्ट्र्य्यादाष्टमे वारे | ३, ३३३ | निमन्त्रितेऽर्डिक्तानि | ३, ४४५ |
| धावन्नाजेच्छया दुर्गां | २, ४ | निमित्तीकृत्य नामद्य | ३, ८९ |
| धावंस्ततोऽतिवेगेन | ३, ४०६ | निरयंकाम्पापुवादान् | ३, १८४ |
| धिग्भामधन्यं यस्याये | २, ३२ | निरालोको हि लोकोऽयं | २, ३७ |
| धिया भाग्यानुगामिन्या | ३, ४९३ | निर्गते मञ्जरीबुद्ध्याद् | १, २०७ |
| ध्रुवापायेन कायेन | ३, ४८ | निर्णयो वर्णगुरुणा | ३, ८५ |
| [ न ] | निर्जलिमिव निर्याति | ३, २९६ | |
| नगराप्रातिलोम्याय | ३, ३५२ | निवातस्तिमितार्दापि° | २, ४४ |
| न चास्माद्दनमादाय | ३, १४५ | निवारितप्रतीहार | २, २७ |
| नदंस्तद्रक्षसा धीरः | २, १०८ | निवारितप्रवेशोऽथ | २, ६८ |
| नन्दिक्षेत्रे विभुवनगुरोः | २, १७० | निवार्य मरणोद्योगं | ३, १२३ |
| नन्दिक्षेत्रे हरावासं | १, ३६ | निविचन्वते हि जंगन्या | ३, ४९१ |
| न पश्येत्सर्वसंवेद्यान् | १, ५ | निशेषं निकटास्स लोक° | २, १६५ |
| नमस्तस्मै ततः कोऽप्य | ३, ५१२ | निष्पुत्र. स महीपालो | २, ७५ |
| न मार्गं न यसो भार्यान् | ३, ४४ | निसर्गतराला नारी. | ३, ५१५ |
| नम्रः सम्राडयेवं स | ३, ६२ | नीलमुद्दिश्य देशस्य | १, १८२ |
| नयता गम्यतामस्मात् | ३, २९४ | नीलोत्पलवतोवापीः | २, १४० |
| नपद्भिर्गुणवत् दोषान् | १, ३५६ | नूनं नन्दीश एवासौ | १, १३० |
| नरः षष्टि तस्य सूनुः | १, ३३४ | नूनं केका च शिखिनो | ३, ३३५ |
| नृपतिस्तस्य दृक्पातं. | ३, ३४१ | ||
| नैति में संशयभ्रान्तम् | ३, ९० |