राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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राजयोग
संक्षेप मे समाधि का तात्पर्य यही है। हमारे जीवन मे इस समाधि की उपयोगिता कहाँ है? समाधि की विशेष उपयोगिता है। हम जान-बूझकर जो काम करते है, जिसे हम विचार का क्षेत्र कहते है, वह सकीर्ण और सीमित है। मनुष्य की युक्ति एक छोटेसे वृत्त मे ही भ्रमण कर सकती है, वह कभी उसके बाहर नही जा सकती। हम जितना ही उसके बाहर जाने का प्रयत्न करते है, उतना ही वह असम्भव-सा जान पड़ता है। ऐसा होते हुए भी, मनुष्य जिसे अत्यन्त कीमती और सबसे प्रिय समझता है, वह तो उस युक्तिराज्य के बाहर ही अवस्थित है। अविनाशी आत्मा है या नही, ईश्वर है या नही, इस जगत् के नियन्ता—परमज्ञान-स्वरूप कोई है या नही—इन सब तत्त्वो का निर्णय करने में युक्ति असमर्थ है। इन सब प्रश्नो का उत्तर युक्ति कभी नही दे सकती। युक्ति क्या कहती है? वह कहती है, "मै अज्ञेयवादी हूँ। मै किसी विषय मे 'हाँ' भी नही कह सकती और 'ना' भी नही।" फिर भी इन सब प्रश्नो की मीमांसा तो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन प्रश्नो के ठीक-ठीक उत्तर बिना मानव-जीवन उद्देश्यविहीन हो जायगा। इस युक्तिरूप वृत्त के बाहर से प्राप्त हुए समाधान ही हमारे सारे नैतिक मत, सारे नैतिक भाव, यही नही, बल्कि मानव-स्वभाव मे जो कुछ सुन्दर तथा महान् है, उस सबकी नीव हैं। अतएव यह सबसे आवश्यक है कि हम इन प्रश्नो के यथार्थ उत्तर पा ले। यदि मनुष्य-जीवन केवल पाँच मिनट की चीज हो, और यदि जगत् कुछ परमाणुओ का आकस्मिक मिलन मात्र हो, तो फिर दूसरे का उपकार मै क्यो करूँ? दया, न्यायपरता या सहानुभूति दुनिया में फिर क्यो रहे? तब तो हम लोगो का यही