भारतकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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ध्यान और समाधि ९९

से उपर्युक्त प्रकार के खतरे की आशंका रहती है। किन्तु इसमें कोई सन्देह नही कि उन सबने उस अवस्था की प्राप्ति की थी। जब कभी कोई महापुरुष केवल भावुकता के बल से इस अतीन्द्रिय अवस्था मे जा पड़े है, तो वे उस अवस्था से कुछ सत्य ही नही लाए, पर साथ ही कुसस्कार, कट्टरपन, ये सब भी लेते आए। उनकी शिक्षा मे जो उत्कृष्ट अश है, उससे जगत् का जैसा उपकार हुआ है, उन सब कट्टरता और अन्धविश्वासों से वैसे ही क्षति भी हुई है। मानव-जीवन नाना प्रकार के विपरीत भावो से ग्रस्त होने के कारण असामंजस्यपूर्ण है। इस असामंजस्य मे कुछ सामंजस्य और सत्य प्राप्त करने के लिए हमें तर्क-युक्ति के अतीत जाना पड़ेगा। पर वह धीरे-धीरे करना होगा, नियमित साधना के द्वारा ठीक वैज्ञानिक उपाय से उसमें पहुँचना होगा, और सारे कुसस्कारो को भी हमे छोड़ देना होगा। अन्य कोई विज्ञान सीखने के समय जैसा हम लोग करते है, इसमे भी ठीक उसी धारा का अनुसरण करना होगा। युक्ति-विचार को ही अपनी नीव बनानी होगी। तर्क-युक्ति हमें जितनी दूर ले जा सकती है, उतनी दूर जायेंगे और जब तर्क-युक्ति नही चलेगी, तब वही हमे उस सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति का रास्ता दिखला देगी। अत यदि कोई अपने को अनुप्राणित कहकर दावा करे, फिर साथ ही युक्ति के विरुद्ध भी अटपट बोलता रहे, तो उसकी बात मत सुनना। क्यो ? इसलिए कि जिन तीन अवस्थाओ की बात कही गई है, जैसे--सहज ज्ञान, विचारजात ज्ञान और ज्ञानातीत अवस्था--ये तीनो एक ही मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। एक मनुष्य के तीन मन नही है, वरन् उस एक ही मन की एक अवस्था दूसरी अवस्थाओ मे परिवर्तित हो