भारतकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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'१०४ राजयोग

गति का और उसके बाद उसकी अपनी प्रतिक्रियाओ का अनुभव करने के लिए नियुक्त करना होगा। जब मन अनुभूति के बाह्य उपकरणो अर्थात् विषयो को पृथक् रूप से जान सकेगा, तब उसमे समस्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थों, सारे सूक्ष्म शरीरो और सूक्ष्म रूपो को जानने की शक्ति आ जायगी। जब वह भीतर मे होनेवाली गतियो को दूसरे सभी विषयो से अलग करके, उनके अपने स्वरूप में, जानने मे समर्थ होगा, तब वह सारी चित्त-वृत्तियो पर उनके भौतिक शक्ति के रूप मे परिणत होने से पूर्व ही अधिकार चला सकेगा,—फिर वे चित्तवृत्तियाँ चाहे स्वय अपनी हो, चाहे दूसरो की। और जब योगी केवल मानसिक प्रतिक्रिया का उसके अपने स्वरूप में अनुभव करने मे समर्थ होगे, तब वे सर्व पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर लेगे, क्योकि इन्द्रिय-गोचर प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि प्रत्येक विचार भी, इस मानसिक प्रतिक्रिया का ही फल है। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर योगी अपने मन की मानो नींव तक का अनुभव कर लेते हैं, और तब मन उनके सम्पूर्ण वश में आ जाता है। योगी के पास तब नाना प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ (सिद्धियाँ) आने लगती है, पर यदि वे इन सब शक्तियो को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठे, तो उनकी भविष्य उन्नति का रास्ता रुक जाता है। भोग के पीछे दौडने से इतना अनर्थ होता है ! किन्तु यदि वे इन सब अलौकिक शक्तियो को भी छोड सके, तो वे मनरूप समुद्र-मे उठनेवाले समस्त वृत्ति-प्रवाहो को पूर्णतया रोकने में समर्थ हो सकेगे। और यही योग का चरम लक्ष्य है। तभी, मन के नाना प्रकार के विक्षेप एव नाना प्रकार की दैहिक गतियो से विचलित न होकर आत्मा की महिमा अपनी पूर्ण ज्योति से