राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंक्षेप में राजयोग [१०७]
कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना या उन्हे क्लेश न देना—यह अहिंसा कहलाता है। अहिंसा से बढकर और धर्म नही। मनुष्य के लिए जीव के प्रति यह अहिंसा-भाव रखने से अधिक और कोई उच्चतर सुख नही है। सत्य से सब कुछ मिलता है, सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है। यथार्थ कथन को ही सत्य कहते है। चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम है अस्तेय। तन-मन-वचन से सर्वदा सब अवस्थाओ मे मैथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य है। अत्यन्त कष्ट के समय मे भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण न करने को अपरिग्रह कहते है। अपरिग्रह-साधना का उद्देश्य यह है कि किसी से कुछ लेने से हृदय अपवित्र हो जाता है, लेनेवाला हीन हो जाता है, वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है और बद्ध एव आसक्त हो जाता है।
तप, स्वाध्याय, सन्तोष, शौच और ईश्वरप्रणिधान—इन्हे नियम कहते हैं। नियम शब्द का अर्थ है नियमित अभ्यास और व्रत-परिपालन। व्रतोपवास या अन्य उपायो से देह-सयम करना शारीरिक तपस्या कहलाता है। वेद-पाठ या दूसरे किसी मन्त्रोच्चारण को सत्त्वशुद्धिकर स्वाध्याय कहते है। मन्त्र जपने के लिए तीन प्रकार के नियम है—वाचिक, उपांशु और मानस। वाचिक से उपांशु जप श्रेष्ठ है और उपांशु से मानस जप। जो जप इतने ऊँचे स्वर से किया जाता है कि सभी सुन सकते हैं, उसे वाचिक जप कहते हैं। जिस जप मे ओठो का स्पन्दन मात्र होता है, पर पास रहनेवाला कोई मनुष्य सुन नही सकता, उसे उपांशु कहते है। और जिसमें किसी शब्द का उच्चारण नही होता, केवल मन-ही-मन जप किया जाता है और उसके साथ उस मन्त्र का अर्थ स्मरण किया जाता है, उसे मानसिक जप कहते