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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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१२२ राजयोग

चला जाता है।) यह हुई द्वैतवाद की भाषा। अद्वैतवाद की भाषा मे यह भाव व्यक्त करने पर कहना पडेगा कि मनुष्य भगवान है, और घूमकर फिर उन्ही मे लौट जाता है। यदि हमारी वर्तमान अवस्था ही उच्चतर अवस्था हो, तो ससार मे इतने दुःख-कष्ट, इतनी सब भयावह घटनाएँ क्यो भरी पडी हैं? यदि यही उच्चतर अवस्था हो, तो इसका अवसान क्यों होता है? जिसमे विकार और पतन होता हो, वह कभी भी सबसे ऊँची अवस्था नही हो सकती। यह जगत् इतने पैशाचिक भावो से क्यो भरा हो—वह इतना अतृप्तिकर क्यो हो? इसके पक्ष में बहुत हुआ तो इतना ही कहा जा सकता है कि इसमें से होकर हम एक उच्चतर रास्ते में जा रहे है, पुन उन्नत-स्वभाव होने के लिए हमें इसमे से होकर जाना ही पडता है। जमीन में बीज बो दो, वह गलकर—विश्लिष्ट होकर कुछ समय बाद मिट्टी के साथ बिलकुल मिल जायगा, फिर उसी विश्लिष्ट अवस्था से एक महाकाय वृक्ष उत्पन्न होगा। इस महाकाय वृक्ष के उत्पन्न होने के लिए प्रत्येक बीज को सडना पडेगा। उसी प्रकार ब्रह्मभावापन्न होने के लिए—ब्रह्मस्वरूप हो जाने के लिए प्रत्येक जीवात्मा को इस अवनति की अवस्था मे से होकर जाना पडेगा। अतएव यह स्पष्ट है कि हम जितनी जल्दी इस 'मानव'-सज्ञक अवस्थाविशेष का अतिक्रमण कर उसके ऊपर चले जायें, उतना ही हमारा कल्याण है। तो क्या आत्म-हत्या करके हमें इस अवस्था के बाहर होना होगा? नही, कभी नही। वरन् उससे तो उलटा ही फल होगा। शरीर को व्यर्थ में कष्ट देना अथवा ससार को वृथा कोसना इस ससार से तरने का उपाय नही है। उसके लिए तो हमे इस नैराश्य के पकिल सरोवर में

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