राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवतरणिका ३
है, उन धर्मों के माननेवालो की सख्या भी अधिक है। जिनकी शास्त्र-भित्ति नही है, वे धर्म प्राय लुप्त हो गए है। कुछ नए उठे अवश्य है, पर उनके अनुयायी बहुत थोडे है। फिर भी उक्त सभी सम्प्रदायो मे यह मतैक्य दीख पडता है कि उनकी शिक्षा विशिष्ट व्यक्तियो के प्रत्यक्ष अनुभव मात्र है। ईसाई तुमसे अपने धर्म पर, ईसा पर, ईसा के अवतारत्व पर, ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व पर और उस आत्मा की भविष्य उन्नति की सम्भवनीयता पर विश्वास करने को कहता है। यदि मै उससे इस विश्वास का कारण पूछूँ, तो वह कहता है, “यह मेरा विश्वास है।” किन्तु यदि तुम ईसाई धर्म के मूल मे जाओ, तो देखोगे कि वह भी प्रत्यक्ष अनुभूति पर स्थापित है। ईसा ने कहा है, “मैने ईश्वर के दर्शन किए हैं।” उनके शिष्यो ने भी कहा है, “हमने ईश्वर का अनुभव किया है।”—इत्यादि-इत्यादि।
बौद्ध धर्म के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है। बुद्धदेव की प्रत्यक्षानुभूति पर यह धर्म स्थापित है। उन्होने कुछ सत्यो का अनुभव किया था। उन्होने उन सबको देखा था, वे उन सत्यो के संस्पर्श मे आए थे, और उन्ही का उन्होने ससार मे प्रचार किया। हिन्दुओं के सम्बन्ध मे भी ठीक यही बात है, उनके शास्त्रो में ‘ऋषि’ नाम से सम्बोधित किए जानेवाले ग्रन्थकर्ता कह गए हैं, “हमने कुछ सत्यो के अनुभव किए हैं।” और उन्ही का वे ससार मे प्रचार कर गए हैं। अत यह स्पष्ट है कि ससार के समस्त धर्म उस प्रत्यक्ष अनुभव पर स्थापित है, जो ज्ञान की सार्वभौमिक और सुदृढ भित्ति है। सभी धर्माचार्यो ने ईश्वर को देखा था। उन सभी ने आत्मदर्शन किया था, अपने अनन्त स्वरूप का ज्ञान सभी को हुआ था, सबने अपनी भविष्य अवस्था देखी थी, और जो कुछ