राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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जाना—जो विचार एक बार उठ चुके हैं, उनका मानो पदानुगमन करना। तुम लोगो ने शायद गौर किया होगा, जब मैं सब लोगो के परिचित कुछ विषयो को लेकर, उन्ही को घुमा-फिराकर कुछ बोलता हूँ, तो तुम सब अनायास ही मेरी बात समझ लेते हो। इसका कारण बस इतना ही है कि इस विचार की लीके या प्रणालियाँ हर एक के मस्तिष्क मे विद्यमान है, और उन पर से होकर केवल बारम्बार आना-जाना मात्र आवश्यक होता है। परन्तु जब कभी कोई नया विषय हमारे सामने आता है, तब मस्तिष्क मे एक नई प्रणाली के निर्माण की आवश्यकता होती है, इसीलिए वह विषय उतनी सरलता से समझ मे नहीं आता। यही कारण है कि मस्तिष्क (मनुष्य नही, मस्तिष्क ही) बिना जाने ही किसी नए प्रकार के भाव द्वारा परिचालित होने से इनकार करता है। वह मानो बलपूर्वक इस नए प्रकार के भाव की गति को रोकने का प्रयत्न करता है। प्राण नई-नई प्रणालियाँ बनाने का प्रयत्न कर रहा है, और मस्तिष्क उसे करने नही देता। बस यही मनुष्य की रक्षणशीलता का रहस्य है। मस्तिष्क मे ये प्रणालियाँ जितने थोडे परिमाण मे होगी और प्राणरूप सुई उसके भीतर जितनी कम लीके तैयार करेगी, मस्तिष्क उतना ही रक्षणशीलताप्रिय होगा, वह उतना ही नए प्रकार के विचार और भाव के विरुद्ध लडाई ठानेगा। मनुष्य जितना ही चिन्तनशील होता है, उसके मस्तिष्क के भीतर के मार्ग उतने ही अधिक जटिल होते हैं, और उतनी ही सुगमता से वह नए-नए भाव ग्रहण कर सकता है तथा उन्हे समझ सकता है। प्रत्येक नवीन भाव के सम्बन्ध मे ऐसा ही समझना चाहिए। मस्तिष्क में एक नवीन भाव आते ही उसके भीतर एक नई