राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 307 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय
साधनपाद
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥
सूत्रार्थ—तपस्या, अध्यात्मशास्त्रो के पठन-पाठन और ईश्वर में समस्त कर्मफलो के समर्पण को क्रियायोग कहते हैं।
व्याख्या—पिछले अध्याय मे जिन सब समाधियों की बात कही गई है, उन्हें प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। इसलिए हमे धीरे-धीरे—विभिन्न सोपानो मे से होते हुए उन सब समाधियों को प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। इसके पहले सोपान को क्रियायोग कहते है। इसका शब्दार्थ है—कर्म के सहारे योग की ओर बढना। हमारी देह मानो एक रथ है, इन्द्रियाँ घोडे है, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है और आत्मा रथी है। यह गृहस्वामी, यह राजा, यह मनुष्य की आत्मा रथ में सवार है। यदि घोड़े बड़े तेज हो और लगाम खिंची न रहे, यदि बुद्धिरूपी सारथी उन घोडो को सयत करना न जाने, तो रथ की दुर्दशा हो जायगी। पर यदि इन्द्रियरूपी घोडे अच्छी तरह से संयत रहे और मनरूपी लगाम बुद्धिरूपी सारथी के हाथो अच्छी तरह थमी रहे, तो वह रथ ठीक अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है। अब यह समझ में आ जायगा कि इस तपस्या शब्द का अर्थ क्या है। तपस्या शब्द का अर्थ है—इस शरीर और इन्द्रियो को चलाते समय लगाम अच्छी तरह थामे रहना, उन्हे अपनी इच्छानुसार काम न करने देकर अपने वश में किए रहना। उसके बाद है पठन-पाठन या स्वाध्याय। यहाँ पाठ का तात्पर्य क्या है ? नाटक, उपन्यास या कहानी की