राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातंजल-योगसूत्र-२ २१९
उस दीवार द्वारा सीमाबद्ध है। पर साथ ही हम अपनी एक इच्छाशक्ति भी देखते हैं और सोचते हैं कि इस इच्छाशक्ति को हम जहाँ चाहे लगा सकते हैं। पग-पग मे हम अनुभव करते हैं कि ये विरोधी भावद्वय हमारे सामने आ रहे हैं। हमे विश्वास करना पडता है कि हम मुक्त हैं, पर इधर प्रति मुहूर्त हम यह भी देखते है कि हम मुक्त नही है। इन दोनो मे से यदि एक भाव भ्रमात्मक हो, तो दूसरा भी भ्रमात्मक होगा, और यदि एक सत्य हो, तो दूसरा भी सत्य होगा, क्योकि दोनों ही अनुभवरूप एक ही नीव पर स्थापित है। योगी कहते हैं कि ये दोनो भाव सत्य है। बुद्धि तक लेने से हम सचमुच बद्ध है पर आत्मा की दृष्टि से हम मुक्तस्वभाव हैं। मनुष्य का यथार्थ स्वरूप—आत्मा या पुरुष—कार्य-कारण श्रृंखला के बाहर है। आत्मा का यह मुक्तस्वभाव ही भूत के विभिन्न स्तरों में से—बुद्धि, मन आदि नाना रूपो में से—प्रकाशित हो रहा है। वह इसी की ज्योति है, जो सबो के भीतर से प्रकाशित हो रही है। बुद्धि का अपना कोई चैतन्य नही है। प्रत्येक इन्द्रिय का मस्तिष्क में एक-एक केन्द्र है। समस्त इन्द्रियो का एक ही केन्द्र नही है, वरन् प्रत्येक का केन्द्र अलग-अलग है। तो फिर हमारी ये अनुभूतियाँ कहाँ जाकर एकत्व को प्राप्त होती है? यदि मस्तिष्क मे वे एकत्व को प्राप्त होती, तो आँख, कान, नाक सभी का एक ही केन्द्र रहता, पर हम निश्चित रूप से जानते हैं कि वैसा नही है—प्रत्येक के लिए अलग-अलग केन्द्र है। फिर भी मनुष्य एक ही समय मे देख और सुन सकता है। इसी से प्रतीत होता है कि इस बुद्धि के पीछे अवश्य एक एकत्व होना चाहिए। बुद्धि सदैव मस्तिष्क के साथ सम्बद्ध है, किन्तु