राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातंजल-योगसूत्र—३ २३५.
व्याख्या—इसी कारण निर्बीज समाधि के साथ तुलना करने पर इनको भी बहिरंग कहना पडेगा । सयम-लाभ होने पर हम वस्तुत सर्वोच्च समाधि-अवस्था की प्राप्ति नही कर लेते, वरन् एक निम्नतर भूमि मे अवस्थित रहते है । उस अवस्था में यह परिदृश्यमान जगत् विद्यमान रहता है, और सब सिद्धियाँ इस जगत् के ही अन्तर्गत हैं ।
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ
निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥
सूत्रार्थ—जब व्युत्थान अर्थात् मन की चंचलता का अभिभव (नाश) और निरोध-सस्कार का आविर्भाव हो जाता है, उस समय चित्त निरोध नामक सस्कार के अनुगत होता है, उसे निरोध-परिणाम कहते हैं ।
व्याख्या—इसका तात्पर्य यह है कि समाधि की पहली अवस्था मे मन की समस्त वृत्तियाँ निरुद्ध अवश्य होती हैं, किन्तु सम्पूर्ण रूप से नही, क्योकि वैसा होने पर तो किसी प्रकार की वृत्ति ही न रह जाती । मान लो, मन मे एक ऐसी वृत्ति उठी है, जो मन को इन्द्रिय की ओर ले जा रही है, और योगी उस वृत्ति को सयत करने का प्रयत्न कर रहे है । इस अवस्था मे उस सयम को भी एक वृत्ति कहना पडेगा । एक लहर मानो दूसरी लहर द्वारा रोकी गई है, अतः वह समस्त लहरो की निवृत्तिरूप समाधि नही है, क्योकि वह संयम भी एक लहर है । फिर भी, जिस अवस्था में मन में तरंग के बाद तरंग उठती रहती है, उसकी अपेक्षा यह् निम्नतर समाधि उस उच्चतर समाधि के अधिक समीपवर्ती है ।
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥१०॥
सूत्रार्थ—अभ्यास के द्वारा इसकी स्थिरता होती है ।