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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 307 में से

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२४४ | राजयोग

व्याख्या—अत्यन्त भूखा मनुष्य यदि कण्ठकूप में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शान्त हो जाती है।

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३२॥

सूत्रार्थ—कूर्मनाडी में (संयम करने से) शरीर की स्थिरता होती है।

व्याख्या—जब वे साधना करते हैं, तब उनका शरीर चञ्चल नहीं होता।

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३३॥

सूत्रार्थ—सिर की ज्योति में (संयम करने से) सिद्धपुरुषों के दर्शन होते हैं।

व्याख्या—यहाँ सिद्ध का तात्पर्य भूतयोनि की अपेक्षा थोड़ी उच्च योनि से है। जब योगी अपने सिर के ऊपरी भाग में मन संयम करते हैं, तब वे इन सिद्धों के दर्शन करते हैं। यहाँ पर 'सिद्ध' शब्द से मुक्त पुरुष नहीं समझना चाहिए।

प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३४॥

सूत्रार्थ—अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होने से समस्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—प्रातिभ ज्ञान अर्थात् प्रतिभा की शक्ति अर्थात् पवित्रता के द्वारा लब्ध ज्ञानविशेष के प्राप्त हो जाने पर बिना किसी प्रकार के संयम के ही समस्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जब मनुष्य उच्च प्रतिभाशक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे इस महा आलोक की प्राप्ति हो जाती है। उसके ज्ञान से समस्त प्रकाशित हो जाता है। बिना किसी प्रकार का संयम किए ही उसे आप-से-आप समस्त ज्ञान प्राप्त होता जाता है।

हृदये चित्तसंवित् ॥३५॥

सूत्रार्थ—हृदय में (संयम करने से) मनोविषयक ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

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