राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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हो जाते है। जब वे सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता इन दोनो को भी त्याग देते हैं, तब वे सारे प्रलोभन, यहाँ तक कि, देवताओं द्वारा दिए गए प्रलोभनो का भी अतिक्रमण कर सकते है। जब योगी इन सब अद्भुत शक्तियो को प्राप्त करके भी उन्हे त्याग देते है, तब वे चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। वास्तव मे ये शक्तियाँ हैं क्या?—केवल अभिव्यक्तियाँ। स्वप्न की अपेक्षा उनमे भला कौनसी श्रेष्ठता है? सर्वशक्तिमत्ता भी तो एक स्वप्न है। वह केवल मन पर निर्भर रहती है। जब तक मन का अस्तित्व है, तभी तक सर्वशक्तिमत्ता सम्भव हो सकती है, पर हमारा लक्ष्य तो मन के भी अतीत है।
स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात् ॥५२॥
सूत्रार्थ—देवताओ द्वारा प्रलोभित किए जाने पर भी उसमें आसक्त होना या आनन्द का अनुभव करना उचित नहीं है, क्योकि उससे पुनः अनिष्ट होना सम्भव है।
व्याख्या—और भी बहुत से विघ्न है। देवता आदि योगी को प्रलोभित करने आते हैं। वे नही चाहते कि कोई पूर्ण रूप से मुक्त हो। हम लोग जैसे ईर्ष्यापरायण है, वे भी वैसे ही हैं, वरन् कभी-कभी तो वे इस बात मे हम लोगो से भी आगे बढ जाते हैं। वे डरते हैं कि कही वे अपने पद को न खो बैठें। जो योगी पूर्ण सिद्ध नही होते, वे शरीर त्यागने के बाद देवता बन जाते हैं। वे सीधे रास्ते को छोडकर मानो बगल के एक रास्ते से चले जाते हैं और इन सब शक्तियो को प्राप्त करते है। उनको फिर से जन्म लेना पडता है। पर जो इतने शक्तिसम्पन्न है कि इन प्रलोभनो का उन पर कोई प्रभाव नही पडता, वे सीधे उस लक्ष्य-स्थल पर पहुँच जाते है और मुक्त हो जाते हैं।