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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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२६४ | राजयोग

अलग देहो में कार्य करते है, 'निर्माणचित्त' कहलाते हैं और इन निर्मित शरीरो को 'निर्माणदेह' कहते है । भूत और मन मानो दो अनन्त भाण्डार के समान है । योगी होने पर ही तुम उन पर अधिकार प्राप्त करने का रहस्य जान सकोगे । तुम्हे तो वह सदैव विदित था, पर तुम उसे भूल भर गए थे । तुम जब योगी हो जाओगे, तो वह फिर से तुम्हारी स्मृति मे आ जायगा । तब तुम उसे लेकर जो इच्छा हो वही कर सकोगे । जिस उपादान से इस बृहत् ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, यह निर्माणचित्त भी उसी उपादान से निर्मित होता है । मन और भूत आपस में एक दूसरे से बिलकुल भिन्न पदार्थ नही है, वे तो एक ही पदार्थ की दो विभिन्न अवस्थाएँ मात्र है । अस्मिता ही वह उपादान, वह सूक्ष्म वस्तु है, जिससे योगी के ये निर्माणचित्त और निर्माणदेह तैयार होते है । अतएव, योगी जब प्रकृति की इन शक्तियो का रहस्य जान लेते है, तब वे अस्मिता नामक पदार्थ से जितनी इच्छा हो, उतने मन और शरीर निर्माण कर सकते हैं ।

तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥

सूत्रार्थ—उन विभिन्न चित्तो में से जो चित्त समाधि द्वारा उत्पन्न होता है, वह वासनाशून्य होता है ।

व्याख्या—विभिन्न व्यक्तियो मे हम जो विभिन्न प्रकार के मन देखते हैं, उनमे वही मन सबसे ऊँचा है, जिसे समाधि-अवस्था प्राप्त हुई है । जो व्यक्ति ओषधि, मन्त्र या तपस्या के बल से कुछ शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है, उसकी तब भी वासनाएँ बनी ही रहती हैं, पर जो व्यक्ति योग के द्वारा समाधि प्राप्त कर लेता है, केवल वही समस्त वासनाओ से मुक्त होता है ।