राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातंजल-योगसूत्र—४ २६७
देह से प्राप्त हुई है। भिन्न जाति की देह से लब्ध सस्कार-समष्टि उस समय स्तिमित रूप से रहती है। प्रत्येक शरीर इस प्रकार कार्य करता है, मानो वह उसी जाति की देह-परम्परा का एक वंशज हो। इस तरह हम देखते हैं कि वासनाओ का क्रम नष्ट नही होता।
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥
**सूत्रार्थ—**सुख की तृष्णा नित्य होने के कारण वासनाएँ भी अनादि हैं।
**व्याख्या—**हम जो कुछ अनुभव या भोग करते हैं, वह सुखी होने की इच्छा से ही उत्पन्न होता है। इस भोग का कोई आदि नही है, क्योकि प्रत्येक नया भोग पहले किए हुए भोग से उत्पन्न प्रवृत्ति या सस्कार पर स्थापित रहता है। अतएव वासना अनादि है।
हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥
**सूत्रार्थ—**हेतु, फल, आश्रय और (शब्दादि) विषय—इनसे वासनाओं का सग्रह होता है, इसलिए इन (चारों) का अभाव होने से उन (वासनाओ) का भी अभाव हो जाता है।
**व्याख्या—**वासनाएँ कार्य-कारणसूत्र से ग्रथित हैं, मन मे कोई वासना उदित होने पर वह अपना फल उत्पन्न किए बिना नष्ट नही होती। फिर, चित्त समस्त पूर्व वासनाओ (कर्म-सस्कारो) का आश्रय है—एक बडा भाण्डारस्वरूप है। ये वासनाएँ संस्कार के रूप मे सचित रहती हैं। जब तक उनका कार्य समाप्त नही हो जाता, तब तक वे नष्ट नही होतीं। फिर, जब तक इन्द्रियाँ बाहरी विषयो को ग्रहण करती रहेंगी, तब तक नई-नई, वासनाएँ भी उठती रहेगी। यदि वासना के