राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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चित्त का अनुभव करता है। तब तो एक ऐसे तीसरे चित्त की आवश्यकता होगी, जो उस दूसरे चित्त का अनुभव करे। अतएव, इस प्रकार इसका कहीं अन्त न होगा। इससे स्मृति की भी गड़बड़ी उपस्थित हो जायेगी, क्योंकि तब स्मृति का कोई निर्दिष्ट भंडार नहीं रह जायगा।
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥
सूत्रार्थ—चित् (पुरुष) अपरिणामी है, चित्त जब उसका आकार धारण करता है, तब वह ज्ञानमय हो जाता है।
व्याख्या—ज्ञान पुरुष का गुण नहीं है, यह हमें स्पष्ट रूप से समझा देने के लिए पतंजलि ने यह बात कही है। चित्त जब पुरुष के पास आता है, तब पुरुष मानो उसमें प्रतिबिम्बित होता है और उस समय के लिए चित्त ज्ञानवान् हो जाता है। तब ऐसा प्रतीत होता है मानो वही पुरुष है।
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥
सूत्रार्थ—चित्त जब द्रष्टा और दृश्य इन दोनों से रंग जाता है, तब वह सब प्रकार के अर्थ को प्रकाशित करता है।
व्याख्या—एक ओर दृश्य अर्थात् बाह्य जगत् चित्त में प्रतिबिम्बित हो रहा है, और दूसरी ओर द्रष्टा अर्थात् पुरुष उसमें प्रतिबिम्बित हो रहा है, इसी से उसमें सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने की शक्ति आती है।
तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥२४॥
सूत्रार्थ—वह (चित्त) असंख्य वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे (अर्थात् पुरुष) के लिए है, क्योंकि यह संहत्यकारी (संयुक्त होकर कार्य करनेवाला) है।
व्याख्या—यह चित्त नाना प्रकार के पदार्थों की समष्टि-