राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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और एक प्रकार का प्राणायाम है, उसमे पहले ६४ मात्राओ मे कुम्भक, फिर ३२ मात्राओ मे रेचक और तत्पश्चात् १६ मात्राओ मे पूरक करना पडता है, प्राणायाम के द्वारा शरीर के सारे दोष दग्ध हो जाते है। धारणा से मन की अपवित्रता दूर हो जाती है, प्रत्याहार से सग-दोष नष्ट हो जाता है तथा ध्यान से आत्मा के ईश्वरभाव को आवृत कर रखनेवाला सारा आवरण नष्ट हो जाता है।
सांख्य-प्रवचन-सूत्र
तृतीय अध्याय
भावनोपचयात् शुद्धस्य सर्वं प्रकृतिवत् ॥२९॥
अर्थ—गंभीर ध्यान के बल से, शुद्धस्वरूप पुरुष के पास प्रकृति की सारी शक्तियाँ आ जाती हैं।
रागोपहतिर्ध्यानम् ॥३०॥
अर्थ—आसक्ति के नाश को ध्यान कहते हैं।
वृत्तिनिरोधात् तत्सिद्धिः ॥३१॥
अर्थ—ध्यान की सिद्धि समस्त वृत्तियों के निरोध से होती है।
धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धि ॥३२॥
अर्थ—धारणा, आसन और अपने कर्तव्य-कर्मों के पालन से ध्यान सिद्ध होता है।
निरोधश्छर्द्दिविधारणाभ्याम् ॥३३॥
अर्थ—श्वास की छर्दि (त्याग) और विधारण (धारण) के द्वारा प्राणवायु का निरोध होता है।
स्थिरसुखमासनम् ॥३४॥
अर्थ—जिससे स्थिर और सुखकर रूप से बैठा जा सके, उसका नाम आसन है।