राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधना के प्राथमिक सोपान २३
हठयोगी अपने वश मे न ला सके। हृदय-यंत्र उसकी इच्छा के अनुसार बंद किया या चलाया जा सकता है —शरीर के सारे अंश वह अपनी इच्छानुसार चला सकता है।
मनुष्य किस प्रकार दीर्घजीवी हो, यही हठयोग का एकमात्र उद्देश्य है। शरीर किस प्रकार पूर्ण स्वस्थ रहे, यही हठयोगियो का एकमात्र लक्ष्य है। हठयोगियो का यही दृढ़ सकल्प है कि मुझे और पीडा न हो। और इस दृढ़ संकल्प के बल से उनको पीडा होती भी नही। वे दीर्घजीवी हो सकते है, सौ वर्ष तक जीवित रहना तो उनके लिए मामूली-सी बात है। उनकी १५० वर्ष की आयु हो जाने पर भी, देखोगे, वे पूर्ण युवा और सतेज है, उनका एक केश भी सफेद नही हुआ किन्तु इसका फल बस यही तक है। वटवृक्ष भी कभी-कभी ५००० वर्ष जीवित रहता है, किन्तु वह वटवृक्ष का वटवृक्ष ही बना रहता है। फिर वे लोग भी यदि उसी तरह दीर्घजीवी हुए, तो उससे क्या ? वे बस एक बडे स्वस्थकाय जीव भर रहते है। हठ-योगियो के दो-एक साधारण उपदेश बडे उपकारी है। सिर की पीडा होने पर, शय्या-त्याग करते ही नाक से शीतल जल पीए, इससे सारा दिन मस्तिष्क अत्यन्त शीतल रहेगा और कभी सर्दी न होगी। नाक से पानी पीना कोई कठिन काम नही, बडा सरल है। नाक को पानी के भीतर डुबाकर गले मे पानी खींचते रहो। पानी अपने-आप ही धीरे-धीरे भीतर जाने लगेगा।
आसन सिद्ध होने पर, किसी-किसी सम्प्रदाय के मतानुसार नाडी-शुद्धि करनी पड़ती है। बहुत से लोग यह सोचकर कि यह राजयोग के अन्तर्गत नहीं है, इसकी आवश्यकता स्वीकार नहीं करते। परन्तु जब शंकराचार्य जैसे भाष्यकार ने इसका विधान