राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधना के प्राथमिक सोपान ३३
शरीर में सर्वत्र भ्रमण कर रहे हैं। और जब हम मन में उनका अनुभव कर सकेगे, तब वे, और उनके साथ देह भी हमारे अधिकार मे आ जायगी। मन भी इन सब स्नायविक शक्ति-प्रवाहों द्वारा संचालित हो रहा है। इसीलिए उन पर विजय पाने से मन और शरीर दोनो ही हमारे अधीन हो जाते हैं, हमारे दास बन जाते हैं। ज्ञान ही शक्ति है, और यह शक्ति प्राप्त करना ही हमारा उद्देश्य है। अतएव स्नायुओ के भीतर जो शक्तिप्रवाह सतत चल रहे है, उनके और शरीर के सम्बन्ध मे ज्ञान प्राप्त कर लेना विशेष आवश्यक है। इसलिए हमे प्राणायाम से प्रारम्भ करना होगा। इस प्राणायाम-तत्त्व की विशेष आलोचना के लिए दीर्घ समय की आवश्यकता है—इसको अच्छी तरह समझाते बहुत दिन लगेगे। हम क्रमश उसका एक-एक अश लेकर आलोचना करेगे।
हम क्रमश समझ सकेगे कि प्राणायाम के साधन मे जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनका हेतु क्या है और प्रत्येक क्रिया से देह के भीतर किस प्रकार की शक्ति प्रवाहित होती है। क्रमश यह सब हमे बोधगम्य हो जायगा। परन्तु इसके लिए निरन्तर साधना आवश्यक है। साधना के द्वारा ही मेरी बात की सत्यता का प्रमाण मिलेगा। मै इस विषय मे कितनी भी युक्तियो का प्रयोग क्यो न करूँ, पर तुम्हे उस समय तक कोई भी उपादेय न जान पड़ेगी, जब तक तुम स्वय प्रत्यक्ष न कर लोगे। जब देह के भीतर इन शक्तियो के प्रवाह की गति स्पष्ट अनुभव करने लगोगे, तभी सारे सशय दूर होगे। परन्तु इसके अनुभव के लिए प्रत्यह कठोर अभ्यास आवश्यक है। प्रतिदिन कम-से-कम दो बार अभ्यास करना चाहिए, और उस अभ्यास का उपयुक्त समय है प्रात और साय। जब रात बीतती है और पौ फटती है तथा जब
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