राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-४४ राजयोग
काल तक चक्कर काटने के बाद वह बदल जाती है और एक दूसरी भँवर में—किसी पशु-देहरूपी भँवर मे—प्रवेश करती है। फिर वहाँ कुछ वर्ष तक घूमती रहने के बाद, हो तो इस वार खनिज पदार्थ नामक भँवर में चली जाती है। बस, सतत परिवर्तन होता रहता है। कोई भी वस्तु स्थिर नही। मेरा शरीर, तुम्हारा शरीर नामक वास्तव मे कोई वस्तु नही। वैसा कहना केवल मुख की बात है। है केवल एक अखण्ड जडराशि। उसी के किसी विन्दु का नाम है चन्द्र, किसी का सूर्य, किसी का मनुष्य, किसी का पृथ्वी, कोई विन्दु उद्भिद् है, तो कोई खनिज पदार्थ। इनमे से कोई भी सदा एक भाव से नही रहता, सभी वस्तुओ का सतत परिवर्तन हो रहा है, जड का एक बार संश्लेषण होता है, फिर विश्लेषण। अन्तर्जगत् के सम्बन्ध में भी ठीक यही बात है। ससार की समस्त वस्तुएँ 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) से उत्पन्न हुई हैं, अतएव इसको हम सारी जड वस्तुओ के प्रतिनिधि के रूप मे ग्रहण कर सकते हैं। प्राण की सूक्ष्मतर स्पन्दनशील अवस्था में इस ईथर को मन का भी प्रतिनिधिस्वरूप कहा जा सकता है। अतएव सम्पूर्ण मनोजगत् भी एक अखण्डस्वरूप है। जो अपने मन में यह अति सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं, वे देखते हैं कि सारा जगत् सूक्ष्मातिसूक्ष्म कम्पनो की समष्टि मात्र है। किसी-किसी औषध में हमको इस सूक्ष्म अवस्था मे पहुँचा देने की शक्ति रहती है, यद्यपि उस समय हम इन्द्रिय-राज्य के भीतर ही रहते हैं। तुममे से बहुतो को सर हम्फ्री डेवी के प्रसिद्ध प्रयोग की बात याद होगी। हास्योत्पादक वाष्प (Laughing Gas) ने जब उनको अभिभूत कर लिया, तब वे स्तब्ध और नि स्पन्द होकर खडे रहे। कुछ देर बाद जब होश आया, तो बोले, 'सारा