राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राण का आध्यात्मिक रूप ५९
समाप्त हो गई है, परन्तु वहाँ से भी तागे के समान एक बहुत ही सूक्ष्म पदार्थ बराबर नीचे उतरता गया है। सुपुम्ना नाली वहाँ भी अवस्थित है, परन्तु वहाँ बहुत सूक्ष्म हो गई है। नीचे की ओर उस नाली का मुँह बन्द रहता है। उसके निकट ही कटिप्रदेशस्थ नाडी-जाल (Sacral Plexus) अवस्थित है। आजकल के शरीरविधानशास्त्र (Physiology) के मत से वह त्रिकोणाकार है। इन विभिन्न नाडी-जालो के केन्द्र मेरुमज्जा के भीतर अवस्थित है, वे नाडी-जाल योगियो के भिन्न-भिन्न पद्मो या चक्रो के तौर पर लिए जा सकते है।
योगियो का कहना है कि सबसे नीचे मूलाधार से लेकर मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार या सहस्रदल पद्म तक कुछ केन्द्र है। यदि हम उन पद्मो को पूर्वोक्त नाडी-जाल (plexus) समझें, तो आजकल के शरीरविधानशास्त्र के द्वारा बहुत सहज ही योगियों की बात का मर्म समझ मे आ जायगा। हमे मालूम है कि हमारे स्नायुओ के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं, उनमे से एक को अन्तर्मुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्मक और दूसरे को गति-आत्मक, एक को केन्द्र की ओर जानेवाला और दूसरे को केन्द्र से दूर जानेवाला कहा जा सकता है। उनमे से एक मस्तिष्क की ओर सवाद ले जाता है, और दूसरा मस्तिष्क से बाहर, समुदाय अगो मे। परन्तु अन्त मे ये प्रवाह मस्तिष्क से सयुक्त हो जाते हैं। आगे आनेवाले विषय को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमे कुछ और बाते ध्यान मे रखनी होगी। यह मेरुमज्जा मस्तिष्क मे जाकर एक प्रकार के 'बल्व' मे—medulla नामक एक अडाकार पदार्थ मे अन्त हो जाती है, जो मस्तिष्क के साथ संयुक्त नहीं है, वरन् मस्तिष्क मे जो एक