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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत रघुनाथसिंह ३२१ शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ज़िलाबंदी कर प्रतापगढ़, कनौरा, बजरंगगढ़, सागथली और मगरा नामक पांच ज़िले बनाये [ज़िलाबंदी होना] जाकर वहां के हाकिमों को माल तथा न्याय संबंधी आवश्यक अधिकार दिये गये। इससे राज्य-प्रबंध में आसानी हुई और जनता के लिए भी, अपने साथ अन्याय होने पर अपील का अधिकार प्राप्त होकर, अपनी फ़रियाद क्रमशः उच्चाधिकारियों और महारावत तक पहुंचाने का मार्ग खुल गया। प्रतापगढ़ राज्य के बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों के दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के फ़ैसले करते थे, जिसकी ठीक व्यव- [सरदारों को न्याय सम्बन्धी अधिकार मिलना] स्था न थी। ठिकानेदारों के किये हुए फ़ैसलों की अपील सुनने का भी कोई साधन न था, जिससे वहां की प्रजा बहुधा न्याय से वंचित रहती थी। वि० सं० १६५१ (ई० स० १८६४) में महारावत ने न्याय-विभाग का कार्य व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए अपने राज्य के प्रथम वर्ग- धमोतर, झांतला, वरडिया, रायपुर, कल्याणपुर, आंवीरामा, अचलावदा, अरणोद और सालिमगढ़—के सरदारों के दीवानी तथा फ़ौजदारी अधि- कार निर्दिष्ट कर निम्नलिखित शर्तें स्थिर कीं- (१) अपने पट्टे के अन्दर आसामियों के दीवानी मुक़दमों में तुमको अख्तियार समाअत तो तादाद बेहद तक का होगा, मगर अख्तियार एक हज़ार तक के दावे के फ़ैसले का ही होगा और इससे अधिक तादाद के सब मुक़दमे, मिसल की तरतीब और तकमील होने के बाद मय अपनी राय के अदालत सदर दीवानी में आख़िरी फ़ैसले के वास्ते तुमको बाज़ाब्ते चालान करने होंगे। उनमें से जो मुक़दमे अदालत सदर दीवानी के द्वारा फ़ैसला करने लायक़ होंगे, उनको तो अदालत मौसूफ़ खुद फ़ैसल करेगी और जो उसके अख्तियार के बाहर होंगे, उनको वो अपनी तजवीज़ के साथ आख़िरी फ़ैसले के वास्ते राजेश्री महकमा खास में भेजेगी। (२) हर क़िस्म के फ़ौजदारी मुक़दमे के समाअत करने का ४१