राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका इतिहास साहित्य का एक प्रधान अंग एवं जाति तथा समाज की वास्त- विक दशा का सच्चा द्योतक है। जाति, समाज एवं व्यक्ति के निर्माण और क्रमिक विकास में इसका बड़ा हाथ रहता है। कुछ समय पूर्व भारतवासी साहित्य के इस आवश्यक अंग की तरफ़ से प्रायः उदासीन रहते थे; परन्तु हर्ष का विषय है कि इधर इस रिक्त अंग की पूर्ति की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित हुआ है और लोगों की प्रवृत्ति इसके पठन-पाठन की तरफ़ क्रमशः बढ़ रही है। जहां कुछ दिनों पहले हिन्दी के ऐतिहासिक ग्रंथों की गणना अंगुलियों पर की जा सकती थी, वहां अब उसमें आशा- प्रद उन्नति दृष्टिगोचर हो रही है। भारतवर्ष के इतिहास में वीरता, उदारता, दानशीलता, विद्याप्रेम, सांस्कृतिक महत्व आदि की दृष्टि से सीसोदिया जाति का प्रमुख स्थान है। सीसोदियों के मेवाड़ राज्य की गणना संसार के प्राचीनतम राज्यों में होती है, क्योंकि वहां गत चौदहसौ वर्षों से एक ही वंश का अक्षुण्ण रूप से राज्य चला आता है। प्रतापगढ़ राज्य के शासक इसी राजवंश की एक शाखा में हैं। आज से लगभग चारसौ पैंतीस वर्ष पूर्व मेवाड़ के महाराणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल ने इस राज्य की नींव डाली थी। तब से अबतक उसके वंशजों का यहां अधिकार चला आता है। बागड़ (डूंगरपुर-बांसवाड़ा), मालवा और मेवाड़ की सीमाओं से मिला हुआ होने से यह राज्य साधारण बोल-चाल में "कांठल" भी कहलाता है। पहाड़ियों तथा गहन वनों से आच्छादित होने के कारण पहले यहां भील, मीणां आदि की ही बस्ती विशेष रूप से थी और आय की दृष्टि से महत्वपूर्ण न-होने की वजह से इसको विजय करने की तरफ़ मुसलमान शासकों का ध्यान नहीं रहा।