रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४० रामायणमीमांसा परिशिष्ट वामहस्तेन मुष्टिं तु बद्ध्वाकर्णप्रदेशकम् । तर्जनीं सरलां कृत्वा भ्रामयेन्मनुवित्तमः ॥ सौभाग्यदण्डिनी मुद्रा न्यासकालेऽपि सूचिता । अन्तरङ्गुष्ठमुष्ट्या तु निरुद्ध्य तर्जनीमिमाम् ।। रिपुजिह्वाग्रहा मुद्रा न्यासकाले तु सूचिता । बद्ध्वा तु योनिमुद्रां वै मध्यमे कुटिले कुरु ।। अङ्गुष्ठेन तदग्रे तु मुद्रेयं भूतिनी मता । वाममुष्टिं विधायथ तर्जनीमध्यमे ततः प्रसार्य तर्जनी मुद्रा निर्दिष्टा वज्रपाणिना ।' अथ प्रधानपूजा— शालग्राम अथवा प्रतिष्ठित मूर्ति में आवाहन और विसर्जन नहीं होते, क्योंकि वहां श्रीहरि सदा ही सन्निहित रहते हैं । “शालग्रामे स्थावरे वा नावाहनविसर्जने । शालग्रामशिलादौ यन्नित्यं सन्निहितो हरिः ॥” मूल और श्रीरामगायत्री का उच्चारण करके 'साङ्गाय सायुधाय सवाहनाय सपरिवाराय सशक्तिकाय रामाय पुष्पाञ्जलिं कल्पयामि नमः' इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि अर्पित कर पूर्वोक्त विधियों से पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, उद्वर्तन और अभ्यङ्ग देकर महास्नान अभिषेक करके वस्त्रादि देकर भगवान् श्रीराम का नीराजन करना चाहिये । पुरुष- सूक्त से शुद्ध शङ्खोदक, क्षीर, दधि, घृत, मधु और शर्करा से पृथक्-पृथक् स्नान कराना चाहिये । नारिकेलजल और तालफल के जल से, बहुत सुगन्ध द्रव्यों से, गन्धोदक से, इक्षुरस तथा कूर्परगन्धवासित जल से, कदली, पनस तथा आम्र के सुगन्धित रस से शत, सहस्र, अयुत यथाशक्ति अभिषेक करना चाहिये । शङ्ख को पुष्पसहित रसों से पूर्ण करके उससे अभिषेक करना चाहिये । बीच-बीच में कृष्णागुरु आदि से धूप करना चाहिये । पुनः शुद्ध जल से स्नान करना चाहिये । राज्यार्थी राज्यप्राप्ति के लिए नित्य इसी प्रकार वत्सरपर्यन्त पूजा करे । अभिषेकानन्तर आचमन के लिए जल देकर वस्त्रयुगल अर्पण करना चाहिये । पुनः आचमन के अनन्तर उत्तरीयसहित यज्ञोपवीत प्रदान करना चाहिये । पादुका मुद्रा से पीठ पर भगवान् को लाकर तुलसीदलमिश्श्रित विविध आभूषणों से आभूषित करना चाहिये । मूलमन्त्र से गन्ध समर्पण करके आठ पुष्पाञ्जलियां देना चाहिये । “ॐ श्रीसीतायै स्वाहा' इस मन्त्र से तप्तकाञ्चनवर्णाभा सीता का वामभाग में पूजन करना चाहिये । त्रिकोण के दक्षिण कोणाग्र में लक्ष्मण की 'ॐ लं लक्षमणाय नमः' इस मन्त्र से पूजा करनी चाहिये । त्रिकोण के वाम- पार्श्व में 'ॐ शां शाङ्गाय नमः' इस मन्त्र से शाङ्गधनुष की और दक्षिणपार्श्व में 'ॐ शं शरेभ्यो नमः' इस मन्त्र से शरों की पूजा करनी चाहिये । फिर बहिरङ्ग पूजा की अनुज्ञा लेकर आवरणपूजा करनी चाहिये । सर्वत्र अनुपनीत एवं उपनयनानधिकृत लोगों को प्रणवरहित नाममन्त्र से ही पूजा करनी चाहिये । इति पुष्पार्र्पणान्ता प्रधानपूजा । अथ आवरणपूजा तत्र प्रथमावरणम्—षट्कोणे वह्नचाशामारभ्य (१) ॐ रां हृदयाय नमः हृदयशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) ॐ रीं शिरसे स्वाहा शिरःशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) रूं शिखायै वषट् शिखाशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) ॐ रैं कवचाय हुम् कवचशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।