भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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इस मन्त्र का सायणोक्त अर्थ यह है कि हे पत्नी एवं यजमान ! वां—तुम दोनों के जाने के लिए गन्त- व्यत्वेन प्रसिद्ध उन सुखमय निवासयोग्य स्थानों की हम ऋत्विक् लोग कामना करते हैं। तदर्थ विष्णु की कामना करते हैं जिनमें अत्यन्त उन्नत गावः—रश्मियां रहती हैं और अयासः—अतिविस्तृत हैं अथवा अत्यन्त प्रकाशयुक्त हैं। जहाँ पर बड़े-बड़े महात्माओं द्वारा स्तुत्य भगवान् का दिव्य धाम स्वमहिमा से ही भासमान होता है। यही मन्त्र निम्न निर्दिष्ट रीति से गोलोकपरक भी माना जाता है। वर्षणशील गोपरूप उरुगाय विष्णु का परम पद भासमान होता है। वहीं बड़े शृङ्गवाली गमनशील बड़ी बड़ी गौएँ हैं। वहो बहुत से शोभन वास्तु—दिव्य धाम हैं। “विष्णुर्गोपाः परमं पाति पाथः प्रिया धामान्यमृता दधानः । अग्निष्टा विश्वा भुवनानि वेद महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥” (ऋ० सं० ३।५५।१०) सायण के अनुसार इस मन्त्र का यह अर्थ है—सबके पालक प्रियतम क्षयरहित तेज को धारण करनेवाले अग्निदेव परम स्थान की रक्षा करते हैं अथवा लोक-धारक अमृर्तों—उदकों को धारण करनेवाले उदकस्थान—अन्तरिक्ष की रक्षा करते हैं। वे अग्निदेव उन सब भुवनों को जानते हैं। वे ही देवों के मुख्य असुरत्व—महान् प्राबल्य एवं ऐश्वर्य का प्रातिनिध्य करते हैं । विनियोग के अनुसार उक्त अर्थ होने पर भी स्वाभाविकरूप से गोपालरूप विष्णु की महिमा का वर्णन भी इस मन्त्र से स्पष्टरूपसे विदित होता है। वे ही विष्णु प्रिय अमृत तेज को धारण करते हैं। वे ही सब भुवनों को जानते हैं। सर्वज्ञता ही उनका महान् ऐश्वर्य है। “इन्द्रं मित्रं वरुण” (ऋ० सं० १।१६४।४६) मन्त्र के अनुसार इन्द्र आदि विष्णु ही हैं। “या ते धामान्युश्मसि” यही मन्त्र शुक्लयजुर्वेद ( ६।३ ) में भी है। वहाँ यह मन्त्र विनियोग के अनुसार यूप का अवट (गर्त) में निक्षेप करते हुए पढ़ा जाता है। मन्त्र का आशय यह है—हे यूप ! तुम्हारे जाने के लिए हम उन दिव्य धामों की कामना करते हैं जिन स्थानों में गावः रश्मियाँ जाती है। यहाँ भी बड़ी बड़ी सींगवाली गायों से युक्त गोलोकपरक अर्थ संगत होता है। आदित्य-मण्डल वर्णन के पक्ष में प्रचुर दीप्ति से युक्त ‘रश्मि’ ही अर्थ है। वह व्यापक विष्णु का परक उत्कृष्ट पद वहीं शोभित होता है। उरु बहुत गान जिनका होता है वह विष्णु है। यह भी प्रस्तुत मन्त्र का आशय मान्य होता हैं कि बहुत महात्माओं द्वारा जिनकी स्तुति होती है उनके दिव्य स्थान की प्राप्ति के लिए हे यूप ! तुम इस अवट में स्थिर रहो । “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ।।” (अथ० सं० १०।२।३१) इसमें विष्णु के अवतार श्रीराम एवं उनकी अयोध्यापुरी का वर्णन है। मन्त्र का आशय यों है— आठ चक्रोंवाली, नव द्वारोंवाली देवताओं की पुरी है। उसका नाम है अयोध्या। उसमें ज्योतिर्मय कोश अर्थात् निधान है। उसी में परमानन्दमय राम ब्रह्मरूप से स्वर्ग-(निरतिशय सुख)-स्थानीय हैं। वह ज्योतियों के ज्योति हैं । प्रायः इसी आनुपूर्वी का मन्त्र तैत्तिरीय आरण्यक में भी मिलता है— “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो लोको ज्योतिषावृतः ।” (तै० आ० १।२।७।३) दिव्य आठ प्रकृतियाँ ही उसके आठ चक्र हैं। उसके आठों दिशाओं एवं ऊर्ध्व की ओर उसके नव द्वार हैं।