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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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प्रामाणिक नहीं, तो बाहर के लोगों, जिनकी भाषा, सभ्यता आदि सब कुछ भिन्न हैं, के निर्णय के आधार पर सत्य पाठ कैसे प्रामाणिक होगा ? पाश्चात्यों का रोग इसी प्रकार "रामायण का रचनाकाल" शीर्षक पृ० ३२ से विचार करते हुए श्रीबुल्के ने अनेक पाश्चात्य विद्वानों के मत उद्धृत करते हुए कहा है कि "ई० एक शताब्दी के पूर्व पहले पहल रामायण ग्रन्थ विख्यात होने लगा था । कुछ विद्वान् इसे बहुत प्राचीन १२ शती से ११ शती ई० पूर्व की रचना मानते हैं। डॉ० वेबर ने रामायण पर यूनानी तथा बौद्ध प्रभाव मानकर उसकी रचना अपेक्षाकृत अर्वाचीन मानी है।" परन्तु ये सब कल्पनाएँ निराधार ही हैं। प्रायः पाश्चात्यों को यह रोग हैं कि वे लोग ईसा से पूर्वकाल में सभ्यता के विकास को असम्भव समझते हैं। अतः वे ईसा के इधर-उधर ही सब महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों तथा ग्रन्थों का काल निश्चित करने का प्रयत्न करते रहते हैं। मूल ग्रन्थ में ही जब रामायण का रचनाकाल निर्दिष्ट है तब फिर अटकल लगाने की क्या आवश्यकता है ? क्या वाल्मीकिरामायण के रचनाकाल के सम्बन्ध में भी ऐसी अटकल लगानी ठीक होगी ? इसी लिए उनका यह भी कहना ठीक नहीं है कि वाल्मीकि की प्रामाणिक रचना आदिरामायण और प्रचलित वाल्मीकिरामायण का काल पृथक् पृथक् है। किन्तु प्रामाणिक अप्रामाणिक रामायण का निर्णय भारतीय परम्परा से रामायण जानने और मानने वाले ही कर सकते हैं न कि यहाँ की भाषा, सभ्यता आदि से अपरिचित कोई विदेशी व्यक्ति । उत्तरकाण्ड में पाठभेद कम होने से उसे अर्वाचीन मानना भी उपहासास्पद ही है। यह कोई व्याप्ति नहीं है कि जो प्राचीन है उसमें पाठभेद हो तथा जो अर्वाचीन है उसमें पाठभेद न हो। तुलसीकृत रामचरितमानस वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा अत्यन्त नवीन रचना है, पर इसमें भी अधिक पाठभेद हैं। आठवें अध्याय में श्रीबुल्के ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि "उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड वाल्मीकिकृत रचना में विद्यमान नहीं थे।" उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के प्रमाण में उन्होंने २२ वें से २६ वें तक पाँच अनुच्छेदों में वर्तमान में उपलब्ध अनेक पाठों की तुलना की है। इसका उत्तर पीछे दिया जा चुका है कि प्रामा- णिक पाठभेद सम्प्रदाय-भेद के कारण है और उसके आधार पर किसी को क्षेपक नहीं कहा जा सकता । दूसरा कारण श्रीबुल्के ने यह कहा है कि युद्धकाण्ड के अन्त में "रामायणमिदं कृत्स्नम्" (वा० रा० ६।१३०।११६) इस फलश्रुति के अनुसार "रामायण ग्रन्थ वहीं समाप्त माना जाता है" यह भी ठीक नहीं है। पहले तो कतक- व्याख्यान के अनुसार फलश्रुतिवाला यह श्लोक युद्धकाण्ड में है ही नहीं, अतः अनिश्चित आधार पर की गयी कल्पना निःसार सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त रामायण के उत्तरकाण्ड के आधार पर, उसके पूर्वकाण्ड और उत्तरकाण्ड ये दो प्रमुख काण्ड मान्य हैं और पूर्वकाण्ड चूंकि सबसे बड़ा है, अतः पूर्वकाण्ड की समाप्ति पर फलश्रुति का कथन कोई अनुचित नहीं है। एक और भी सुन्दर तर्क है, वह यह कि यदि फलश्रुति ही ग्रन्थसमाप्ति का चिह्न हो तो पहले ही अध्याय के अन्त में फलश्रुति है— "पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् । वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयात् जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥" (वा०रा० १।१।१००) ऐसी स्थिति में यह भी मानना क्या उचित होगा कि केवल एक प्रथम सर्ग ही रामायण है और शेष सब क्षेपक ही है। पर यह समझना क्या असङ्गत नहीं है ? गीता के १५ वें अध्याय में भगवान् ने कहा है—मैंने यह गुह्यतम शास्त्र तुम्हारे लिए कहा है। इसको जानकर बुद्धिमान् पुरुष कृतकृत्य हो जाता है— "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ।" (गी० १५।२०)

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