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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अन्धे होने मात्र से दूसरे को भी अन्धा कहना अन्धता का ही परिचय देना है। यह कैसे हो सकता था कि राम, सीता आदि का जो विशाल चरित्र हजारों श्लोकों में लिखा गया, उसमें चरितनायक के जन्म, स्थान, पिता, माता और विवाह आदि का उल्लेख तक न किया जाय। जब आज का साधारण लेखक भी ऐसी भूल नहीं करता है तो सर्वज्ञ महर्षि वाल्मीकि ऐसी भूल कैसे कर सकते थे ? भूमिका के बारे में यही बात है; क्योंकि जब भूमिका के बिना कोई सामान्य लेख या भाषण भी नहीं होता, तब भूमिका के बिना “गच्छता मातुलकुलम्” ( वा० रा० २।१।१ ) अयोध्याकाण्ड के इस श्लोक से आदि काव्य रामायण का आरम्भ कैसे संगत हो सकता था ? साथ ही जब विष्णु या परमात्मा का मर्त्यलोक में किसी कारण से आगमन या अवतार का वर्णन हुआ तब कार्य के सम्पन्न हो जाने पर उनका स्वधाम में प्रवेश-वर्णन भी उचित ही है; अतः उत्तरकाण्ड बालकाण्ड की भांति ही अत्यन्त संगत है। आज भी किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के जन्म और स्वर्गवास दोनों का ही वर्णन होना अनिवार्य माना जाता है। अतः ऐसी ऊटपटांग कल्पनाओं के बल पर वाल्मीकिरामायण जैसे पवित्रतम पूजनीय ग्रन्थ के पूरे के [L1