भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १२ ) अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥३०॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥३१॥ अर्थात् आप भोक्ता और भोग्य रूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शनचक्रधारी श्री- विष्णु हैं, एकशृङ्ग वराह तथा भूत और भव्य सकल शत्रुओं के विजेता हैं। आप ही आदि, अन्त और मध्य में रहनेवाले सत्य अक्षर हैं। सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रिय- नियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप ही अजित खड्गधर विष्णु, बृहद्वल कृष्ण, सेनानी एवं ग्रामणी हैं। आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है। सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय एवं कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ॐकार हैं। आप ही परात्पर परमेश्वर हैं। आप की उत्पत्ति और निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति और लय से विरहित नित्य हैं। आप कौन हैं यह कोई नहीं जानता, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में, विशेष रूप से गौ एवं ब्राह्मणों में, दृष्टिगोचर होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों और नदियों में अन्तर्यामी रूप से आप योगियों के दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष और नेत्र आपके ही हैं। सभी भूतों पर्वतों सहित पृथिवी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथिवी के कारण- रूप जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। हे श्रीराम, मैं (ब्रह्मा) आपका हृदय हूँ, सरस्वती आपकी जिह्वा हैं एवं मेरे द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्र के रोम हैं। आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आपका कोप ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्सलक्षण सोम है। आपने अपने तीन पगों से तीनों लोकों को आक्रान्त कर, दारुण बलि को बाँधकर, इन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं और आप प्रजापति विष्णु हैं। रावण के वधार्थ ही आप मानव-देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम लोगों का (देववृन्द का) कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो गया है। अब अप्प प्रसन्नतापूर्वक परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ पराक्रम है। आपका दर्शन और स्तवन भी अमोघ है। भूतलवर्ती आपके भक्त नर भी अमोघ (सर्वत्र साफल्यसम्पन्न) होंगे। वे भक्त ऐहलौकिक सकल कामनाओं को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराणपुरुषोत्तमरूप को प्राप्त होंगे। देवाधिदेव महादेवजी की सन्निधि में इन्द्रादि दिक्पालों के समक्ष राम के सम्बन्ध में लोकपितामह ब्रह्माजी की यह भूतार्थ व्याहृति है। श्रीराम के अनन्त गुण हैं अनन्तगुणगणमण्डित परब्रह्म परमात्मा के अवतार राम का पाश्चात्य मति यदि आकलन न कर सके तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? परमतत्त्व राम को जानने के लिए मन की शुद्धि अपेक्षित है। अशुद्ध मन में राम के यथार्थ ज्ञान की क्षमता नहीं। यद्यपि “अजस्य गृह्णतो जन्म निरीहस्य हतद्विषः । स्वपतो जागरूकस्य याथाथ्र्यं वेद कस्तव ॥”