रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णु तुल्यपराक्रमान् । सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान् ॥” ( वा० रा० १।१७।१-४,७ ) इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु की सहायता के लिए शक्तिशाली विष्णु तुल्य पराक्रम से युक्त वानरों को उत्पन्न करने के लिए ब्रह्मा ने देवताओं से कहा था। वहीं ब्रह्मादि देवताओं का जाम्बवान्, वाली, सुग्रीव एवं हनुमान् आदि के रूप में उत्पन्न होना भी वर्णित है। “पूर्वमेव मया सृष्टौ जाम्बवानृक्षपुङ्गवः । वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् ।। सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतांवरः । मारुतस्यौरसः पुत्रो हनुमान्नाम वानरः ॥ वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे । सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि ॥” ( वा० रा० १।१७।७,१०,१६,१७ ) रामरहस्य उपनिषद् में भी जाम्बवान्, हनुमान् आदि को ब्रह्मा, रुद्र आदि का अवतार कहा गया है । बुल्के का यह कथन कि “रामायण में वर्णित दण्डकारण्य और लङ्का की घटनाएँ अलौकिक एवं काल्पनिक प्रतीत होती हैं,” निराधार ही है; क्योंकि वह वर्णन वस्तुस्थिति का ही यथार्थ चित्रण है । रावण जैसे शक्तिशाली तपःप्रभाव से युक्त अनेक अनितरसाधारण शत्रुओं का वध करने के लिए विष्णु एवं विविध महान् देवताओं का नर तथा वानर रूप में आविर्भाव के कारण कथावस्तु की अलौकिकता स्वाभाविक है। हाँ, बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् अवतारवाद में विश्वास न रखने के कारण ही ऐसे अनितरसाधारण वर्णन में अतिशयोक्ति की कल्पना करें तो उसमें क्या आश्चर्य ? संसार में सब घटनाएँ साधारण ही नहीं होतीं; असाधारण घटनाओं का वर्णन भी असाधारण ही होता है। अतः यह यथार्थ है कि सम्पूर्ण रामायण घटनामूलक है। उसका कोई अंश कल्पनामूलक नहीं है। रामायण महाकाव्य के निर्माता को ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि तुम्हारी कथा में अनृत वाक्य न होगा । “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” ( वा० रा० १।२।३५ ) इतना ही नहीं, उन महर्षि ने समाधिजा प्रज्ञा से रामायण से सम्बद्ध सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षा- त्कार कर ही उल्लेख किया है । इस कथन में रामायण ही प्रमाण है । डा० वेबर के अनुसार रामायण का समस्त काव्य एक रूपकमात्र है जिसके द्वारा दक्षिण की ओर आर्य- सभ्यता और कृषि का प्रचार दिखलाया जाता है । प्रधान पात्र सीता, जिसका हरण पुनः प्राप्ति काव्य की कथावस्तु कोई ऐतिहासिक व्यक्ति न होकर खेत की सीता (लाङ्गलपद्धति), जिसे आर्यकृषि का प्रतीक मानना चाहिये, का मानवीकरणमात्र है । वैदिक सीता, कृषि की अधिष्ठात्री देवी, और रामायण की सीता अभिन्न हैं। रामायण में सीता के जन्म और तिरोधान सम्बन्धी वृत्तान्त इनकी ओर निर्देश करते हैं । उसकी बहन उर्मिला के नाम का अर्थ लहराता हुआ खेत समझना चाहिये । भवभूति के उत्तररामचरित में भी उसके पिता जनक का एक विशेषण 'सीरध्वज' मिलता है जो कृषि से सम्बन्ध रखता है। (डा० बेलवलकर उसके पुत्र का भी उल्लेख करते हैं। कुश एक घास का नाम है और लव लुनने में आता है । ) आदिवासियों के आक्रमणों से इस सीता, आर्यकृषि के प्रतीक, की रक्षा राम पर निर्भर है। डा० वेबर के अनुसार राम दाशरथि और बलराम (हलभृत् ) का सम्बन्ध स्वयं सिद्ध है। प्रारम्भ में ये एक थे, बाद के विकास में वे दो भिन्न-भिन्न पात्रों के रूप में प्रसिद्ध हो गये । राम का वनवास हेमन्त ऋतु का प्रतीक है जब प्रकृति और विशेषकर कृषि का कार्य स्थगित होता है। इसके अतिरिक्त महाभारत में जहाँ २४